खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 33

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पुनः उŸोजित होने लगा। डॉ. अम्बेडकर और दलित वर्गों द्वारा चौदार तालाब से पानी लेने के प्रयासों का उपहास करने की योजना बनाने हेतु सत्याग्रह आंदोलन के विरोधियों की एक बैठक 27 नवम्बर, 1927 को वीरेश्वर मंदिर में हुई। परंतु दलित वर्गों से सहानुभूति रखने वालों की उपस्थिति के कारण बैठक कोलाहल के साथ समाप्त हो गई। पूना के कुछ हिन्दू नेताओं ने सवर्ण हिन्दुओं को आंदोलन का विरोध करने के लिए मना किया, परंतु वे माने नहीं।

जिलाधीश 7 दिसम्बर को महाद गए, और दोनों पक्षों के नेताओं ने उस प्रश्न पर उनसे चर्चा की। उन्होंने सवर्ण हिन्दुओं से कहा कि वे कानून का सहारा लें और उन्होंने अछूतों को चौदार तालाब से पानी लेने से मना करने वाला आदेश जारी करने से इंकार कर दिया। अतः, रूढि़वादी वर्ग के नेताओं ने दलित वर्गों के नेताओं, डॉ. अम्बेडकर शिवतारकर और कृष्णजी एस. कदम और महाद के गन्या मलू चम्भार के विरुद्ध महाद के सिविल न्यायालय में 12 दिसम्बर, 1927 को एक मुकदमा दायर कर दिया और अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करने के लिए कहा। न्यायालय ने मुकदमे का फैसला होने तक 14 दिसम्बर को प्रतिवादियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा जारी कर दी। तद्नुसार, डॉ. अम्बेडकर, शिवतारकर और कृष्णजी एस. कदम को नोटिस जारी किए गए जिनमें उनको तथा सभी दलित वर्गों अथवा उनकी ओर से इन तीन नेताओं को अगले आदेशों तक चौदार तालाब पर जाने या उससे पानी लेने से मना कर दिया गया। रूढि़वादी और प्रतिक्रियावादी ताकतों ने बड़ी समझदारी से डॉ. अम्बेडकर पर दो मोर्चों पर लड़ाई थोप दी। एक ओर तो उदासीन विदेशी सरकार थी और दूसरी तरफ रूढि़वादी ब्राह्मणों के नेतृत्व वाला सवर्ण हिन्दू वर्ग।‘‘ ख्1,

p ©n kj
r kyk
e ke y
v LF kk;
fu "ksèk kK
d k
e wy
vkn Col2 Col3
vkn

यह एक आवेदन-पत्र है जिसमें न्यायालय से निवेदन किया गया है कि वह आवेदकों की अस्थायी निषेधाज्ञा को मंजूर करके विपक्ष को चौदार तालाब पर जाने अथवा उससे पानी लेने से रोका जाए। आवेदकों ने 12 दिसम्बर, 1927 को इस न्यायालय में 1927 का नियमित मुकदमा संख्या 405 दायर किया जो यह घोषणा किए जाने के लिए था कि उक्त चौदार तालाब केवल स्पृश्य वर्गों की निजी संपिŸा है और अछूत वर्गों को उस तालाब पर जाने तथा उससे पानी लेने का अधिकार नहीं है। यह इस स्थायी निषेधाज्ञा को प्राप्त करने के संबंध में भी था कि प्रतिवादियों को इनमें से कोई भी कार्य करने से रोका जाए।

  1. कीर, पृष्ठ 90 और 97-98।