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आवेदक इस आवेदन-पत्र के द्वारा प्रार्थना करते हैं कि मुकदमे के निपटारे तक प्रतिवादियों के विरुद्ध एक अस्थायी निषेधाज्ञा जारी की जाए। आवेदन-पत्र में अन्य बातों के साथ-साथ यह कहा गया है कि सैंकड़ों वर्षों से यह तालाब केवल स्पृश्य वर्गों के उपयोग के लिए रहा है, कि 19 मार्च, 1927 को प्रतिवादी के नेतृत्व में अछूत वर्गों के बहुत से लोगों ने अचानक तालाब में प्रवेश किया, उन्होंने अपने हाथ और मुंह पानी से धोये और इस प्रकार इसको दूषित कर दिया कि इस संदूषण के कारण स्पृश्य वर्ग 24/25 घंटों तक अर्थात् जब तक कि पानी को बड़ी लागत पर, हिन्दू शास्त्रों में निर्धारित विधि-विधानों को पूरा करके शुद्ध नहीं किया गया, तालाब से पानी नहीं ले सके कि इस प्रकार स्पृश्य वर्गों को बड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, कि अछूत वर्गों ने एक घोषणा-पत्र जारी किया है जिसमें उन्होंने तालाब में पुनः प्रवेश करने और उससे पानी लेने के अपने इरादे की घोषणा की है, कि यदि उनको ऐसा करने दिया जाता है, तो स्पृश्य वर्ग शास्त्रों के अनुसार तालाब के पानी का उपयोग नहीं कर पाएंगे, कि इसके परिणामस्वरूप गंभीर कठिनाई हो जाएगी और यदि मांगी गई अस्थायी निषेधाज्ञा मंजूर नहीं की जाती है और प्रतिवादियों को वादियों के पानी को दूषित करने दिया जाता है तो चाहे वादी अन्ततः मुकदमा जीत जाएं, तो भी उन्हें डिक्री का लाभ नहीं मिलेगा।
आवेदन-पत्र, वादी संख्या 1 के अतिरिक्त अनेक व्यक्तियों के शपथ-पत्रों द्वारा समर्थित है। वादियों ने प्रदर्श 4 के साथ एक नोटिस भी प्रस्तुत किया है जिसे नगरपालिका द्वारा एक दिवाकर जोशी (शपथ पत्र देने वाले व्यक्तियों में से एक व्यक्ति) के विरुद्ध जारी किया गया था जिसमें उससे कहा गया था कि वह चौदार तालाब से सटे हुए पत्थर के धक्कास (बांधों) की मरम्मत करे, और धरप परिवार के विभाजन का विलेख जो कथित रूप से एक सौ साल से भी अधिक पुराना है, भी प्रस्तुत किया। इस विलेख में विभाजित की गई संपिŸा के रूप में तालाब के पाल का उल्लेख है। ये दोनों दस्तावेज तालाब के निजी संपिŸा होने की प्रथम दृष्टया उपधारणा पैदा करते हैं।
अब प्रश्न यह है कि क्या इसको मना करने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा मंजूर करना अधिक ठीक होगा। अस्थायी निषेधाज्ञा संबंधी विधि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 में अंतर्विष्ट है। इस आदेश का नियम इस प्रकार है : जहाँ किसी मुकदमे में शपथपत्र द्वारा या अन्यथा यह साबित हो जाता है (क) कि मुकदमे में विवादाग्रस्त किसी संपिŸा को मुकदमे में किसी पक्ष द्वारा बर्बाद किए जाने, क्षतिग्रस्त किए जाने या हस्तांतरित किए जाने का खतरा हो, अथवा किसी डिक्री के निष्पादन में उसे सदोषतया कहा गया हो या (ख) कि प्रतिवादी अपने ऋणदाताओं के साथ धोखा