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समस्त वतनदारों में, कुलकर्णी को सर्वाधिक प्रिय नेशन क्लाज का फायदा दिया गया है। वह सेवा करने की बाध्यता से मुक्त किया गया है। वह सेवा नहीं करता फिर भी उसकी जमीन उसके पास रहती है, उसे केवल जूड़ी देनी होती है और उसे 1913-14 में सरकार द्वारा देय आकरनी और पोटगी का एक तिहाई हिस्सा सतत् प्राप्त करने की अनुमति है। इसके अलावा, हालांकि पंरागत सेवा करने का कुलकर्णी का अधिकार सरकार द्वारा संराशीकरण की स्कीम द्वारा समाप्त कर दिया गया था फिर भी, सरकार ने अपने संकल्प द्वारा उसे तलती के रूप में नियोजित होने का अधिमानी अधिकार प्रदान कर दिया है। यह कुलकर्णी के स्थान पर सरकार द्वारा सृजित एक एजेंसी है।
अब मैं जो सवाल उठाना चाहूंगा वह यह है कि यदि सरकार ने जो सिद्धांत या नीति अपनाई है वह ’सेवा नहीं वेतन नहीं’ अथवा ’जितनी सेवा उतना वेतन’ है तब उक्त सिद्धांत ब्रिटिश सरकार ने (i) वर्षासान्दार, (ii) इनामदार और जागीरदार, (iii) आनुवंशिक जिला अधिकारी, (iv) अन्य ग्राम अधिकारी और (v) कुलकर्णी के मामले में, जो सभी सेवा करने की बाध्यता से मुक्त किए गए हैं किन्तु जिन्हें अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा अपने पास रखने की अनुमति दी गई है, क्यों नहीं लागू किया ? दूसरे वतनदारों के साथ किए गए व्यवहार विशेषकर कुलकर्णी के साथ किए गए व्यवहार की तुलना में महारों के साथ किया गया व्यवहार नितांत क्रूरतापूर्ण है। महारों के साथ भेदभाव की सीमा इससे ज्यादा नहीं हो सकती थी। यह सिद्धांत महारों पर ही क्यों लागू किया गया ? इस पक्षपातपूर्ण विभेद का क्या स्पष्टीकरण है ? मैं मानता हूं, मैं इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं खोज पाया। इसके विपरीत मैं यह सुझाव देना चाहता हूं कि जो सिद्धांत महारों के संबंध में लागू करना चाहा गया है वह गलत सिद्धांत है और दूसरे वतनदारों के संबंध में अपनाई गई नीति सही है। पेशवा शासन में लागू कानून के अनुसार वतन सम्पत्ति दाययोग्य ही नहीं थी बल्कि वह अन्य-संक्रम्य भी थी जिससे कि वतनदार अपने पद एवं अपनी वतन सम्पत्ति दोनों को अन्यसंक्रमित (दूसरे को अंतरित) कर सकता था। वतन संपत्ति निजी संपत्ति जैसी थी और वतनदार उसका मालिक होता था और वह अपनी मर्जी से उसका कुछ भी कर सकता था। यह कानून 1827 तक चला। इसके बाद बम्बई सरकार ने 1827 के विनियम सं. XVI द्वारा पहली बार वतन सम्पत्ति को अन्य असंक्राम्य घोषित किया तथा किसी भी एकमात्र पदधारी द्वारा या परिवार में से ऐसे पद