314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के किसी सह भागीदार द्वारा अपने जीवनकाल से अधिक कालावधि के लिए
उसका अन्य संक्रामण निषिद्ध कर दिया।
- वतन संपत्ति की ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि सरकार ने
वतन जमीनों के विषय में वतनदारों में देश भर में व्याप्त भावना को भड़काए
बिना जो कुछ किया था वह उससे भिन्न कुछ नहीं कर सकती थी। मेरी
सादर दलील यह है कि महार की वतन किसी भी अर्थ में दूसरी वतनों
से भिन्न नहीं है और यदि इन वतनों के संराशीकरण में सरकार ने ’काम
नहीं वेतन नहीं’, की नीति अथवा ’जितना काम उतना वेतन’ की नीति
लागू नहीं की है तो महार की वतन के बारे में उसे लागू करने का कोई
औचित्य नहीं है।
- जूड़ी बढ़ाने का एक दूसरा कारण यह बताया गया कि निम्न ग्राम सेवकों
के एक अन्य वर्ग के पारिश्रमिक की व्यवस्था करने के लिए यह आवश्यक
है। श्री बी. के. गायकवाड विधायक को संबोधित राजस्व विभाग के तारीख
11 नवम्बर, 1938 के पत्र सं. एल. ए. 26-एफ में राजस्व विभाग में बम्बई
सरकार के उप सचिव श्री एम. जे. देसाई, आई. सी. एस. ने बढ़ी हुई
जूड़ी के औचित्य के बारे में इस प्रकार कहा था -
‘‘3. मध्य मंडल में एक महार का न्यूनतम मानक पारिश्रमिक वह जमीन है
जिसका नुकसान, गांव के आकार के अनुसार 10/-रु. से लेकर 20/-
रुपये तक है अथवा 50/- रु. से लेकर 100/- रु. तक नकद भत्ता
है। आज भी ऐसे बहुत सारे निम्न ग्राम सेवक हैं जिन्हें इतना पारिश्रमिक
भी नहीं मिलता। बहुत कम वेतन वाले निम्न ग्राम सेवकों के लिए बढ़े हुए
वेतन की व्यवस्था सुदृढ़ रूप से आगे बढ़ रही है। उसे पूरा करने का
एक स्रोत है उन लोगों के वेतन में कमी जिनका पारिश्रमिक वेतनमान से
बहुत अधिक है।’’
- इस उद्धरण से यह बात साफ हो जाती है कि जूड़ी बढ़ाकर महारों का
पारिश्रमिक घटाने का एक कारण और कदाचित वास्तविक कारण दूसरे
निम्न ग्राम सेवकों के बेहतर पारिश्रमिक की व्यवस्था करना है। इसमें कोई
संदेह नहीं हो सकता कि सभी निम्न ग्राम सेवकों को बहुत कम वेतन
मिलता है और महारों को उनके कार्यों को ध्यान में रखते हुए, दूसरे निम्न
ग्राम सेवकों से ज्यादा वेतन नहीं दिया जाता। लेकिन यदि यह मान लें
कि दूसरे निम्न ग्राम सेवकों का पारिश्रमिक बढ़ाने का मामला है तो मैं
सादर निवेदन करूंगा कि इसे कार्यान्वित करने के लिए सरकार द्वारा