27. वतनदार महारों, मेंगों आदि की शिकायतों से संबंधित अभ्यावेदन। - Page 334

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  1. उपरोक्त आधारों पर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार की

ओर से यह जूड़ी उगाहना अत्यंत मनमानी और गैर-कानूनी कार्रवाई है।

  1. इस संबंध में, मैं महामहिम के समक्ष ऐसी वस्तुस्थिति प्रस्तुत करना चाहता

हूं जो महारों के पारिश्रमिक के विषय में इस प्रेजिडेन्सी के कुछ क्षेत्रों

में विद्यमान है। महारों का पारिश्रमिक तीन स्रोतों से आता है। वे हैं -

(1) इनाम जमीन, (2) ग्रामवासियों से बलूता जो ग्रामवासी द्वारा महार

को वस्तु के रूप में प्रति वर्ष दिया जाता है, और (3) सरकारी खजाने से

नकद भुगतान। प्रथम और अंतिम स्रोत हर जिले में नहीं पाए जाते हैं। ऐसे

अनेक जिले हैं जिनमें दूसरा अर्थात् बलूता पूरी प्रेजिडेन्सी में पाया जाता

है और महारों के पारिश्रमिक का प्रमुख तरीका है। ऐसे गांवों की संख्या

किसी भी तरह कम नहीं है। बेलगांव जिले में 317, बीजापुर जिले में 543,

धारबाड जिले में 572 और शोलापुर में 463 गांव हैं जिनमें कोई जमीन

नहीं है और जिनमें आमदनी का मुख्य स्रोत बलूता है जो गांववासियों से

इकट्ठा किया जाता है। थाणा, कोलाबा और रतनगिरी जिलों में भी यही

स्थिति है। उन गांवों की यह सूची जिनमें बलूता महारों के पारिश्रमिक का

एकमात्र स्रोत है, पूरी नहीं है। लेकिन उपलब्ध आंकड़ों से यह साफ है

कि कुछ गांवों में महार मुख्यतः बलूता पर निर्भर रहते हैं, दूसरे गांवों में

वे अपने पारिश्रमिक के लिए पूरी तरह इसी पर निर्भर रहते हैं।

  1. महारों को पारिश्रमिक देने के एक ढंग के रूप में बलूता के संबंध में,

मैं सबसे पहले महामहिम का ध्यान पारिश्रमिक के इस ढंग के विद्वेषपूर्ण

स्वरूप की ओर आकृष्ट करना चाहूंगा। महार सरकारी सेवक होते हैं।

सरकार उनसे सेवा लेती है, लेकिन उनके पारिश्रमिक के लिए सरकार

उन्हें ग्रामवासियों के पास भेजती है। सरकारी सेवकों के साथ इस तरह

का व्यवहार करना अपमानजनक नहीं तो बड़ा विचित्र समझा जाएगा। यह

परिपाटी निश्चय ही किसी भी सरकार के लिए अशोभनीय है जो अपने

आपको सभ्य कहती है।

  1. बलूता की इस विद्वेषपूर्ण व्यवस्था के फलस्वरूप महारों के पारिश्रमिक

के विषय में उनके साथ घोर अन्याय होता है। सरकार महारों का कुल

पारिश्रमिक नियत करने के लिए ग्रामवासियों द्वारा महारों को दिए जाने

वाले बलूता को अपने हिसाब में लेती है। लेकिन यह सार्वजनीत अनुभव

है कि महारों को बलूता कभी नहीं मिलता। कारण प्रकट है। महारों और

ग्रामवासियों में संबंध कभी भी सौहार्दपूर्ण नहीं रहता। ऐसा कोई गांव