318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं है जिसमें महारों और ग्रामवासियों में मतभेद न हो। अक्सर यह होता है कि महारों और ग्रामवासियों में संबंध मैत्रीपूर्ण रहते हैं और महार पूरा साल ग्रामवासियों एवं सरकार के लिए इस आशा में काम करते हैं कि उन्हें ग्रामवासियों से बलूता मिलेगा। लेकिन फसल पकने के समय पर कोई ऐसी बात हो जाती है जिससे महारों और गांव वालों में तनाव हो जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि ग्रामवासी महारों को उनका बलूता देने से इंकार कर देते हैं। बलूता देने से बचने की उनकी सहज इच्छा के साथ-साथ महारों और ग्रामवासियों के बीच दुश्मनी पैदा हो जाती है। प्रेजिडेन्सी के समस्त गांवों में यह एक-सी स्थिति है और इसी के कारण बलूता व्यवस्था नाकाम रही है। परिणामस्वरूप, महार इस आशा में काम करता है कि बलूता मिलेगा, लेकिन बलूता उसे कभी नहीं मिलता। महार के पास बलूता के संदाय के लिए विवश करने की कोई शक्ति नहीं है। वह गांव में अलपसंख्यक होता है और पूरी तरह गांव पर निर्भर रहता है। इस परस्पर झगड़े में नुकसान उसी का होता है। यह अन्याय सरकारी अधिकारियों के आचरण के कारण असह्य होता है। वे महारों से सेवा करवाते हैं लेकिन ग्रामवासियों से बलूता वसूलने में कभी भी उनकी मदद नहीं करते। कानून में एक प्रावधान है जिसके द्वारा राजस्व प्राधिकारियों को बलूता को नकद भुगतान में बदलने और भू-राजस्व के साथ ग्रामवासियों से उसे वसूलकर महारों को देने की शक्ति है। लेकिन बहुत सारे सरकारी अधिकारी ग्रामवासियों के नाराज हो जाने के डर से महारों को इस अन्याय से छुटकारा दिलाने की इन शक्तियों का प्रयोग करने से बराबर मना कर देते हैं।
- एक समय बलूता व्यवस्था सभी ग्राम सेवकों पर लागू होती थी। यह पाटिल और कुलकर्णी एवं महारों को लागू होती थी। लेकिन सरकार ने सन् 1844 से पाटिल और कुलकर्णी के संबंध में बलूता व्यवस्था बंद कर दी और उसके स्थान पर सरकारी खजाने से नकद भुगतान की व्यवस्था लागू की। इसका कारण यह बताया गया कि पाटिल और कुलकर्णी, अपने प्राधिकार के बल से, ग्रामवासियों से बलूता के उनके कोटे से अधिक वसूल कर सकते थे। यदि पाटिल और कुलकर्णी को बलूता भुगतान की व्यवस्था समाप्त करने का कारण सही कारण था तो उसे महारों पर लागू न करने का कारण बेहतर कारण है। पाटिल और कुलकर्णी अधिक वसूली करने के लिए काफी शक्तिशाली थे। महार इतने कमजोर हैं कि वे कुछ