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भी वसूल नहीं कर सकते। ऐसा लगता है, सरकार ने केवल ग्रामवासियों
के हित के बारे में सोचा। उसने महारों के हितों के बारे में कभी नहीं
सोचा। यदि उसने सोचा होता तो वह महारों के संबंध में भी बलूता के
रूप में पारिश्रमिक की इतनी मूल्यवान व्यवस्था को समाप्त कर देती अथवा
महारों को बलूता की समय से अदायगी कराने के लिए कोई व्यवस्था
करती। सरकार की ओर से महारों को ग्रामवासियों जैसे तीसरे पक्ष द्वारा
अदा किए जाने पर छोड़ देना गलत है, क्योंकि ग्रामवासियों और महारों
के बीच कोई सीधा संवेदात्मक संबंध विद्यमान नहीं है, और साथ ही वह
यह पक्का करने के लिए कोई दबाव डालने के लिए तैयार नहीं था कि
तीसरे पक्ष द्वारा अदायगी की जाए।
- इसलिए यह सवाल प्रासंगिक है। पाटिल से बलूता पर आश्रित रहने के
लिए नहीं कहा जाता है। कुलकर्णी को भी बलूता पर आश्रित रहने के लिए
विवश नहीं किया जाता था जब वह ग्राम सेवक था। तब असहाय महार से
ही यह क्यों कहा जाता है कि सरकार की सेवा करे और भुगतान के लिए
गांव वालों की तरफ देखे जबकि उसे लागू करने के लिए उसके पास कोई
साधन नहीं है ? अब समय आ गया है कि सरकार महारों को पारिश्रमिक
देने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेकर उनके साथ न्याय करे।
- जहां तक पारिश्रमिक के स्रोत के रूप में नकद भुगतान का संबंध है,
महारों के पारिश्रमिक के रूप में सरकार द्वारा नियत धनराशि इतनी निम्नतम
है जितनी कल्पना की जा सकती है। यह रकम 1869 के आसपास कभी
नियत की गई थी। उन दिनों नियत अन्य सरकारी सेवकों की पारिश्रमिक
राशि समय-समय पर काफी मात्रा में बढ़ाई गई है। महारों के साथ
निष्पक्षता और न्याय की दृष्टि से इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि
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में वृद्धि
- बम्बई सरकार ने राजस्व विभाग का संकल्प सं. 7420/33, तारीख
13.9.1938 पारित किया। उसमें इस प्रेजिडेन्सी में महारों, मंगों और वेठियाओं
द्वारा किए जाने वाले कार्यों की एक सूची दी गई है। इन कार्यों से उनके
ऊपर असह्य बोझ आ गया है जो इन वतनदारों के लिए सहन करना
असंभव है। सरकारी संकल्प में विहित कार्यों के बारे में हरेगांव सम्मेलन में
काफी कटु आलोचना हुई। सम्मेलन में पारित संकल्पों में, जो इस ज्ञापन