खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 35

18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करने की दृष्टि से अपनी संपिŸा को हटाने अथवा बेचने की धमकी देता हो या इरादा रखता हो, तो न्यायालय, आदेश द्वारा, अस्थायी ब्यादेश दे सकता है। खंड (ख) स्पष्टतः वर्तमान मामले में लागू नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान मामला खंड (क) में आता है।

यह एक ऐसा तालाब है जो वर्षों से स्पृश्य वर्गों के विशिष्ट उपयोग में रहा है। प्रतिवादी 1 और अन्य लोगों के हस्ताक्षरों सहित जारी किया गया घोषणापत्र भी यह दिखाता है कि अछूत वर्गों का अब तक यह विचार था कि उनको तालाब में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। इस प्रकार इससे ऐसा प्रतीत होता है कि तालाब अब तक स्पृश्य वर्गों के विशिष्ट उपयोग में रहा है। अब प्रश्न यह है कि क्या न्याय का उद्देश्य पुरानी स्थिति में हस्तक्षेप करके अथवा इसे पक्षों के अधिकारों पर अंतिम निर्णय होने तक चलते रहने देकर अधिक अच्छे ढंग से प्राप्त किया जा सकता है।

अस्थायी निषेधाज्ञाओं पर लागू सिद्धांतों का सारांश, सिविल प्रक्रिया संहिता पर मुल्ला की टीका 8वां संस्करण में पृष्ठ 892 पर दिया गया है। उनमें से एक सिद्धांत यह है कि न्यायालय को यह देखना चाहिए कि पक्षों के बीच वास्तविक विवाद है। मुझे प्रतीत होता है कि इसके बारे में बहुत कम संदेह है। दूसरा सिद्धांत यह है कि ‘‘यदि निषेधाज्ञा जारी नहीं की जाती है, तो सफलता की दशा में, अधिक असुविधा किस पक्ष को होगी’’। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि निषेधाज्ञा जारी नहीं की जाती है, तो अधिक असुविधा वादियों को होगी। यह बात इतनी स्पष्ट है कि मैं नहीं समझता कि मुझे इस पर कुछ भी मेहनत करने की आवश्यकता है।

यदि प्रतिवादियों को तालाब में प्रवेश करने दिया जाता है और इस प्रकार (वादियों की धार्मिक धारण के अनुसार) पानी को दूषित करके उसे आगे उपयोग के लिए अनुपयुक्त कर दिया जाता है तो एक बड़ी आबादी को कठिनाई और असुविधा होगी जो इतनी गंभीर होगी कि केवल ऐसे स्थानों में रहने वाले लोग ही उसे समझ सकते हैं, जहां कि पानी की प्रचुर आपूर्ति नहीं होती। दूसरी तरफ, यदि प्रतिवादियों से कहा जाए कि मुकदमे के पहले विनिश्चय तक, वे जिसे अपना अधिकार समझते हैं, उसका प्रयोग न करें, तो उनको किसी प्रकार की असुविधा नहीं होगी। यह रास्ता मुझे न केवल उचित और न्यायसंगत प्रतीत होता है बल्कि ‘यथापूर्व स्थिति’ बनाए रखने के लिए जो कि अनिवार्य है, इन परिस्थितियों में एकमात्र सही रास्ता भी है। आई.एल.आर. 46 कलकŸा, पृष्ठ 1030 पर अंकित टिप्पणी द्वारा आवेदकों (वादियों) द्वारा यह भी दलील दी गई कि यदि जैसे कि मांग की गई है, अस्थायी निषेधाज्ञा मंजूर नहीं की जाती है और तालाब के पानी को दूषित करने दिया जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप वादियों की अपूरणीय क्षति होगी। इस पर विचार करते