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हुए कि इस विषय पर स्पृश्य वर्ग सामान्यतः कितने संवेदनशील हैं, जिसका कारण उनकी धार्मिक भावनाएं तथा दोनों समुदायों के बीच प्राचीन काल से चला आ रहा अंतर है, मैं इस शर्त को बहुत महत्व देने के लिए प्रवृŸा हूं। मुझे कोई संदेह नहीं है कि शिक्षा का प्रसार यथा समय, इन दशाओं को महत्वपूर्ण तरीके से बदल देगा और दोनों समुदायों को एक दूसरे के साथ स्पष्ट तथा मैत्रीपूर्ण संपर्क में लाएगा और अस्पृश्यता विगत की बात हो जाएगी। परंतु जैसी वर्तमान स्थिति है, मैं अवश्य ही आवेदकों की इस भावना को अधिक महत्व दूंगा कि यदि पानी को दूषित करने दिया जाता है, तो उससे जो क्षति जारी रहेगी, वह ऐसा होगी कि उसकी पर्याप्त क्षतिपूर्ति नहीं हो सकेगी।
इस सब परिस्थितियों पर विचार करते हुए, मैं समझता हूं कि यदि मैं उस निषेधाज्ञा को, जिसकी प्रार्थना की गई है, अस्वीकार नहीं करता हूं तो मैं अपने कŸार्व्य पालन में असफल रहूँगा। जिस कŸार्व्य का पालन करने के लिए मुझे कहा गया है, वह बहुत दुःखदायी है, किन्तु कŸार्व्य के आगे पसंद की कोई गुंजाइश नहीं होती। अतः मैं आदेश देता हूं कि एक अस्थायी निषेधाज्ञा जैसे कि मांग की गई है, नोटिस के साथ जारी की जाए।
(हस्ताक्षर) जी. वी. वैद्य‘‘ ख्1,
14.12.1927
दलित वर्गों की ओर से ‘‘सम्मेलन’’ के लिए विस्तृत तैयारियां की गईं। चूंकि किसी भी हिन्दू जमींदार ने पंडाल के लिए अपनी जमीन के प्रयोग की अनुमति नहीं दी, अतः बड़ी कठिनाई से एक मुस्लिम से सम्मेलन के लिए जगह प्राप्त की गई। चूंकि स्थानीय व्यापारियों ने सम्मेलन से संबंधित लोगों से कोई लेन-देन करने से इंकार कर दिया, अतः स्वागत समिति को अनाज और अन्य सामान, जो कि दस दिन तक पहले बाहर से खरीदना पड़ा। अनन्तराव चित्रे ने बहुत कुशलता से यह कार्य किया। सूबेदार घाटगे को भोजन का प्रबंध और अनुशासन तथा व्यवस्था के रखरखाव का कार्य सौंपा गया। जिले के सभी सरकारी मुख्य प्रशासक 19 दिसम्बर को महाद में एकत्र हुए। चौदार तालाब के चारों तरफ पुलिस तैनात की गई। महाद में 21 दिसम्बर से प्रतिनिधि और दर्शक आने लगे। प्रतिनिधियों को प्रस्तावित सत्याग्रह से रोकने के लिए जिलाधीश प्रतिदिन उनके शिविर में जाते थे।
- खैरमोड, खंड 3, पृष्ठ 234-237।