340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(4) ऐसा फैसला आने पर ब्रिटिश सरकार उसे भारत के लिए डोमिनियन
संविधान के अंग स्वरूप प्रभावी रूप देने का काम करे।
उस घोषणा से सभी युक्तिवान लोग संतुष्ट होने चाहिए। जहां तक मैं देख पा रहा हूं, इससे श्री जिन्ना के दृष्टिकोण का तथा दलित वर्गों के दृष्टिकोण की भी तुष्टि हो जाएगी कि साम्प्रदायिक समस्या का समाधान सहमति से हो। इससे कांग्रेस के दृष्टिकोण की भी तुष्टि हो जाएगी कि ब्रिटिश भारत के राष्ट्रीय जीवन के किसी भी घटक को डोमिनियन संविधान के निर्माण पर विषेधाधिकार प्राप्त न हो। हम अभी युद्ध के बीच में हैं, यह तर्क घोषणा के खिलाफ नहीं है। यह वास्तव में उसके पक्ष में है।
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क्या घोषणा के साथ ही राष्ट्रीय सरकार बन जानी चाहिए ? यदि ऐसा हो जाए तो अच्छा होगा। लेकिन कठिनाई यह है कि श्री जिन्ना की दो मांगें हैं- (1) एक अंतिम अर्थात् पाकिस्तान, (2) दूसरी तुरन्त अर्थात् कैबिनेट में 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व।
जब श्री जिन्ना कहते हैं कि मुस्लिम एक राष्ट्र है तो मैं पाकिस्तान की मांग को ठीक समझ सकता हूं। मैं झगड़े का कोई कारण महसूस नहीं करता। जब श्री जिन्ना कहते हैं कि मुस्लिमों को पाकिस्तान मिलना चाहिए क्योंकि वे एक राष्ट्र हैं तो मैं कहता हूं ले लीजिए, यदि आप हिन्दू आबादी का एक बड़ा हिस्सा उसके द्वारा न छीन लें। हिन्दू आपकी अपनी विचारधारा के अनुसार एक भिन्न राष्ट्र हैं।
पाकिस्तान के बारे में मैं यह महसूस करता हूं कि श्री जिन्ना, लगता है, अंडे सेने से पहले ही मुर्गी के बच्चों की गिनती कर रहे हैं, और मेजबान के बिना उनका हिसाब लगा रहे हैं।
उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत इस पाकिस्तान का अत्यंत अभिन्न अंग है। श्री जिन्ना को यह अवश्य मानना होगा कि वह उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के मेजबान नहीं हैं। मेजबान हैं खान अब्दुल गफ्फार खान। उनकी सम्मति के बिना कोई पाकिस्तान नहीं बन सकता। पाकिस्तान के लिए तूफानी प्रचार करने के बजाय श्री जिन्ना को खान अब्दुल गफ्फार खान का मन बदलने में अपना समय और शक्ति लगानी चाहिए। तथापि, यह सोचना श्री जिन्ना का काम है। जैसा कि मैंने कहा था, मैं पाकिस्तान की बात समझ सकता हूं।