342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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हम राष्ट्रीय जीवन में पृथक घटक हैं
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जब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर वायसराय की कार्य परिषद के सदस्य बन गए तो लंदन के एक पत्रकार श्री बेवरली निकोलास ने उनका साक्षात्कार लिया। श्री बेवरली ने सन् 1944 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ’वरडिक्ट ऑन इंडिया’ में उनका साक्षात्कार छापा। उस साक्षात्कार में डॉ. अम्बेडकर के बारे में जो वैयक्तिक विचार प्रकट किए गए थे वे निम्न प्रकार थे - संपादक
’पचास के आसपास का एक आदमी अपने घर के बरामदे में एक लचीली कुर्सी में बैठा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। भारी भरकम शरीर, प्रगामी व्यक्तित्व, अत्यंत मोहक व्यवहार, लेकिन बलिष्ठ अपने जूतों के फीतों को कसते हुए। लगता था, चौकन्ना है, मानों सभी दिशाओं से व्यंग्यबाणों को झेलने को तैयार हों। ठीक है, आखिरकार यही तो उम्मीद थी।
इस प्रकार मेरी डायरी का अंश नीचे उद्धृत है :-
वह आदमी है डॉक्टर अम्बेडकर। क्षणभर में ही हम जानेंगे कि वह क्या है ’जिसकी उम्मीद ही थी’।
डॉ. अम्बेडकर भारत सरकार में श्रम सदस्य हैं। वह भारत में छह सर्वश्रेष्ठ मेधावीजनों में से एक हैं। वह विचारधारा के कूटनीतिज्ञ हैं, विशुद्ध यथार्थवादी। जब वह जनता के बीच बोलते हैं तो प्रेरक, सर्जक तथा मुद्दे से घबराये हुए। हिन्दू चार्ट की पिस्तौल की गोलियों की बौछारों से तुलना करते हुए।
परिणामस्वरूप, वह भारत में सर्वाधिक घृणा के पात्र व्यक्ति हैं।
और ऐसा क्यों है, ’केवल उम्मीद के अनुरूप है’। यह घबराहट - यह सुझाव देना कि वह आक्रमण का जवाब देने के लिए तैयार रहेंगे ?
ऐसा इसलिए क्योंकि 18 करोड़ सवर्ण हिन्दुओं की निगाह में डॉ. अम्बेडकर ’अछूत’ हैं। ऐसा आदमी है जिसकी मेफेयर डिनर जैकट अगर उनकी धोती से छू भर जाए तो प्रदूषण फैल जाए। ऐसा प्राणी जिसके छूने से चरम रूढि़वादी लोग ऐसे उड़ने लगें मानो वह कोई पेपर हो, कोई पिशाच हो जिसके मामूली संपर्क से बाध्य होकर वे निकटतम बाथ ट्यूब में समा जाएं और स्वयं को साबुन से धोयें और प्रार्थना करें तथा पूजा-अर्चना करें और बार-बार साबुन से धोयें, और प्रार्थना करें, ताकि