खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 37

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. अम्बेडकर ने दो सौ प्रतिनिधियों और नेताओं के दल के साथ 24 दिसम्बर की प्रातः बंबई से प्रस्थान किया। दूसरे दिन वे दोपहर को महाद से पांच मील दूर दासगांव में उतरे। वहां 3,000 सत्याग्रहियों के दल ने उत्सुक चेहरों से अपने नेता की प्रतीक्षा की। जब उन्होंने अपने नेता को देखा, तो उन्होंने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया।

स्वागत के पश्चात, पुलिस अधीक्षक ने डॉ. अम्बेडकर को जिलाधीश का एक पत्र दिया, जिसमें उनसे अनुरोध किया गया कि वे बिना समय गंवाए जिलाधीश से उनके महाद कार्यालय में मिलें। डॉ. अम्बेडकर अपने एक लेफ्टिनेंट, सहस्रबुधे के साथ शीघ्र ही उनके कार्यालय गए। जिलाधीश ने तत्काल मृदु स्वर में आंदोलन के स्थगन के लिए परामर्श दिया, तर्क दिया और दबाव डाला, परंतु नेता जिले के मुख्य प्रशासक से पूर्ण रूप से सहमत नहीं हुए। तथापि, यह सहमति हो गई कि उन्हें सम्मेलन को संबोधित करने का अवसर दिया जाना चाहिए। इसी बीच प्रतिनिधियों का जुलूस दासगांव से चल चुका था और यह जुलूस गाने गाता हुआ जिसके बीच में आकाश को चीरने वाले नारे लगाए जाते थे - पुलिस अधिकारियों के साथ अपराह्न में ढाई बजे महाद पहुंचा। इस विशाल भीड़ ने ‘‘शिवाजी महाराज की जय’’ के घोष के बीच पंडाल में प्रवेश किया। पंडाल में खम्बों से लटकती हुई लोकोक्तियां प्रेरित करने वाले अमर सत्य को प्रकट रही थीं। प्रवेश द्वार के सामने एक गड्ढ़ा था।

जिलाधीश के साथ साक्षात्कार के पश्चात् डॉ. अम्बेडकर तुरन्त पंडाल में गए और उन्होंने अपने आम अनुयायियों के साथ अपना मध्याह्न का भोजन किया। उन्होंने विशेष भोजन करने से इंकार कर दिया।

सम्मेलन ने अपनी कार्यवाही शाम को चार बजकर तीस मिनट पर आरंभ की। अनेक विशिष्ट व्यक्तियों से प्राप्त संदेश पढ़े गए जिनमें सत्याग्रह की सफलता की कामना व्यक्त की गई थी। तत्पश्चात् नेता सम्मेलन को संबोधित करने के लिए उठे, जिस पर पन्द्रह हजार लोगों के विशाल जनसमूह ने ऊंची आवाज में जय-जय-कार किया और नारे लगाए। उनमें से अधिकतर की शरीर पर कपड़े नहीं थे उनकी पुरानी पगडि़यां फटी हुई थीं, उनकी दाढि़यां नहीं बनी हुई थीं, परंतु उनके धूप से झुलसे हुए चेहरे विशेष प्रकार के उत्साह और आशा से चमक रहे थे। विशाल श्रोतागण शांत हो गया और डॉ. अम्बेडकर ने अपना भाषण धीमी शिष्ट किन्तु प्रभावशाली आवाज में आरंभ किया। ख्1,

  1. कीर, पृष्ठ 98-99