344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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अनुसूचित जातियों की बस्ती बंटुओं की तरह बनाई जाएं
हैदराबाद (डकन) 22 अप्रैल, 1946’’ : डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, श्रम सदस्य, भारत सरकार ने एक साक्षात्कार में विचार व्यक्त किया कि पृथक गांवों की अनुसूचित जातियों की मांग किसी पार्टी के अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि देश में खेती योग्य बेकार जमीन के बड़े-बड़े क्षेत्र
खाली पड़े हैं जहां कोई खेती नहीं हो रही है। उसे अनुसूचित जातियों को बसाने के लिए पृथक निश्चित किया जा सकता है। इस प्रस्ताव को कार्यरूप देने के लिए सरकार एक न्यास बना सकती है।
उनका विचार था कि वही लोग इस पर आपत्ति करेंगे जो अनुसूचित जातियों के लोगों को श्रम के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने के आदी हो गए हैं। वे मजदूर सारे गंदे काम करने के लिए उपलब्ध हैं और सबसे सस्ती दरों पर काम करने के लिए बाध्य किए जा सकते हैं। वे चाहेंगे कि यह दासता शाश्वत चलती रहे। अनुसूचित जातियां बम्बई और मद्रास जैसे प्रांतों में असह्य अवस्था में रहती हैं इसलिए उनके लिए पृथक गांव होना आवश्यक है।
डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट किया कि ये गांव समाज की सामाजिक इकाई होंगे न कि आर्थिक, इसलिए इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि इन पृथक गांवों की आर्थिक दुर्दशा हो जाएगी।
इन क्षेत्रों में बनी चीजें उन स्थानों पर भेजी जाएंगी जहां लोग उन्हें स्वीकार करेंगे।
जब डॉ. अम्बेडकर से पूछा गया कि क्या यह मांग पाकिस्तान क्षेत्रों पर भी लागू होगी तो उन्होंने कहा कि हां, लागू होगी। फिलहाल पाकिस्तान के बारे में कोई ठोस स्थिति नहीं है। ठोस आकार लेने के बाद ही पृथक गांव स्थापित करने का सवाल पैदा होगा।
उन्होंने कहा, अनुसूचित जातियों की स्थिति दक्षिण अफ्रीका के बंटुओं तथा अन्य जनजातियों के सदृश होगी। वह यह नहीं समझ पाए कि अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा के उपाय भावी भारतीय संविधान में उसी प्रकार क्यों न किए जाएं जैसे बंटुओं की स्थिति में दक्षिण अफ्रीकी संविधान में किए गए थे- ए. पी.-।’’ ख्1,
- द टाइम्स आफ इंडिया, तारीख 23 अप्रैल, 1946. ।