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हिन्दुओं ने अनुसूचित जातियों को हमेशा हिन्दू समाज की परिधि से
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बाहर माना
इंग्लैंड से स्वदेश लौटने के कुछ ही समय बाद 20 नवंबर, 1946 को बम्बई में ’ग्लोब’ को दिए अनन्य साक्षात्कार में डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर ने कहा कि लंदन में दिए अपने वक्तव्य में फेर-बदल करने का उनके पास कोई कारण नहीं है। लंदन में डॉ. अम्बेडकर ने 5 करोड़ अछूतों का प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की धुंधली तस्वीर खींची थी तथा भविष्यवाणी की थी कि देश का भविष्य तब तक अच्छा नहीं होगा जब तक उनके राष्ट्रीय जीवन के सभी महत्वपूर्ण घटकों का प्रतिनिधित्व करने वाले वास्तविक गठबंधन द्वारा उनका नेतृत्व नहीं होगा।
जब डॉ. अम्बेडकर से पूछा गया कि क्या वह यह उचित मानते हैं कि श्री जिन्नाह के नवीनतम वक्तव्य की दृष्टि से और देश में असंतोष व्याप्त होने के कारण 9 दि संबर के लिए नियत संविधान सभा का अधिवेशन स्थगित कर दिया जाए तो उन्होंने कहा कि, ’मेरे अनुसार सवाल यह है कि यदि मुसलमान संविधान सभा में अनुपस्थित रहें तो क्या संविधान सभा के पास कोई नैतिक प्राधिकार होगा। यदि मुसलमानों ने अनुपस्थित रहने का फैसला किया तो मैं नहीं जानता कि संविधान सभा तारीख 9 को या बाद में किसी तारीख को अधिवेशन करने पर कोई काम कर पाएगी।
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कोई महत्व नहीं होगा
उन्होंने आगे कहा कि, ‘’जब तक हिन्दू यह नहीं मानेंगे कि उनके द्वारा बनाया गया संविधान केवल इसलिए ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वीकृत होना संभव है कि जिस अधिवेशन में वे भाग ले रहे हैं उसे संविधान सभा कहते हैं, तो मुझे कोई आशा नजर नहीं आती कि संविधान सभा द्वारा, जो केवल हिन्दुओं से मिलकर बनी है, लिए गए फैसलों का कोई महत्व होगा।’’
’’क्या आपको ऐसा कोई ठोस मूलभूत आधार दिखाई पड़ता है जिसके अनुसार प्रमुख राजनीतिक दलों में कोई समझौता हो सकता है ? उन दलों में अनुसूचित जातियां भी शामिल हैं जिनका प्रतिनिधित्व अनुसूचित जाति फेडरेशन द्वारा किया गया है। इस प्रश्न का डॉ. अम्बेडकर ने यह जवाब दिया, ’’अनुसूचित जातियां और अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों अर्थात् हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच समझौते का आधार बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है यदि कांग्रेस में सद्बुद्धि और उचित बुद्धि रहे।