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पृथक निर्वाचकमंडल मंजूर किए बिना अनुसूचित जातियों को राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करना एक कपट है। जिसका अनिवार्यतः प्रभाव होगा एक हाथ से देना और दूसरे हाथ से लेना।
’’ध्यान देने योग्य यह होगा कि कांग्रेस पूरे भारत में विभिन्न प्रांतीय विधानमंडलों में अनुसूचित जातियों के लोगों को अपने टिकट पर निर्वाचित करवाने में सफल रही है।’’ डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा- ’’लेकिन फिर भी उनमें से एक ने भी कभी अनुसूचित जातियों की शिकायतों को उठाने के लिए सवाल नहीं पूछा, संकल्प पेश नहीं किया, कोई प्रस्ताव सदन के पटल पर नहीं रखा। कारण यह है कि कांग्रेस टिकट पर निर्वाचित अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि कांग्रेस पार्टी के अनुशासन से पूरी तरह आबद्ध होते हैं, और वे कार्रवाई करने के लिए आजाद नहीं होते।’’
उन्होंने आगे कहा ’’विधानमंडल में ऐसे प्रतिनिधि होने से अच्छा है कोई प्रतिनिधि न हो।’’
आनुपातिक प्रतिनिधित्व
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‘‘क्या आनुपातिक प्रतिनिधित्व इस विवाद का हल होगा, इस सवाल के बारे में, मैं यह कहना चाहूंगा कि मैंने इस सवाल पर विचार किया है और मेरा निष्कर्ष है कि इससे काम नहीं बनेगा, क्योंकि यदि विधानमंडल के सदस्यों की संख्या को अब विहित सीमा के अंतर्गत रखें अथवा जिसे युक्तियुक्त माना जाए, तो अनुसूचित जातियां उतने मतदाता नहीं जुटा पाएंगी जितने विधानमंडल में अपने स्वयं के आदमियों के चुनाव के लिए आवश्यक हैं।’’
डॉ. अम्बेडकर ने आगे सवाल का जवाब दिया, ’’क्या अनुसूचित जातियों के लिए यह संभव नहीं कि वे एक समान अधिकारों, विशेषाधिकारों के चार्टर के आधार पर तथा समस्त सामाजिक निर्योग्यताओं को हटाकर अपने आपको हिन्दू समाज में विलय कर लें।’’
उन्होंने उत्तर दिया, ’’हिन्दू समाज में अनुसूचित जातियों के विलय का सवाल वास्तव में हिन्दू समाज की इच्छा पर निर्भर करता है,’’। अछूतों ने हमेशा चाहा है और इसकी कोशिश भी की है, लेकिन वे कभी भी हिन्दुओं के दृष्टिकोण को बदलने में कामयाब नहीं हो पाए क्योंकि हिन्दुओं ने उन्हें हमेशा हिन्दू समाज के घेरे से बाहर माना है। ’’