348 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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’’अनुसूचित जातियां अब यह समझ गई हैं कि हिन्दू समाज में अनुसूचित जातियों को मिलाना या मिलाया जाना एक निष्फल आशा है और मात्र एक सपना है। इसीलिए उन्होंने पृथक निर्वाचकमंडल की मांग करने का निश्चय किया है।
’’यदि हिन्दू अनुसूचित जातियों को मंदिर और केंटीनें खोलकर अपने में मिला सकते हैं, जो कि ऊपरी तरीके से नहीं जैसे वे चाहते हैं, बल्कि ’मिलाना’ शब्द के वास्तविक और सारवान अर्थ में हो जैसे परस्पर शादियां और परस्पर खाना-पीना, तो अछूत उसके लिए हमेशा तैयार और तत्पर हैं।’’
डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा, ’’उसी सवाल का एक दूसरा पहलू यह है कि अनुसूचित जातियों की राय में हिन्दू समाज में उनका विलय तभी आसान होगा जब अछूत उसी सामाजिक स्तर पर पहुंच जाएं जिस पर हिन्दू हैं। वर्तमान निम्नस्तरीय हालात में कोई भी हिन्दू, चाहे वह कितना भी समाज सुधारक हो, अछूत के साथ
खान-पान की, आपस में शादी-ब्याह की सम्मति नहीं देगा, लेकिन यदि, राजनीतिक अधिकारों के परिणामस्वरूप, अछूत लोग बेहतर शिक्षा पा लेते हैं, अधिक उन्नत हो जाते हैं, तथा राज्य में अधिकारियों और प्रशासकों के पदों पर आसीन हो जाते हैं तो उनमें और हिन्दुओं में आपस में शादी ब्याह और खान-पान के अवसर और अधिक हो जाएंगे।
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इस दृष्टिकोण से, जो राजनीतिक रक्षोपाय अछूतजन चाहते हैं, वे किसी भी अर्थ में, उन्हें अपने में मिलाने और विलय करने की हिन्दुओं की इच्छा के प्रतिकूल नहीं हैं। जब अछूतों के पृथक निर्वाचकमंडल होंगे तो यह समझना मुश्किल है कि हिन्दुओं को उन्हें सामाजिक दृष्टि से अपने समूह में मिलाने में कठिनाई क्यों होनी चाहिए। उन्हें आपस में शादी-ब्याह करने से और खान-पान करने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए अनुसूचित जातियों की पृथक निर्वाचक मंडलों की मांग के प्रति कांग्रेस का पूरा दृष्टिकोण अज्ञानता और हठधर्मिता पर आधारित है।’’ पूज्य गोरडन लिविंग्सटन द्वारा हाल ही में दिए गए इस कथन पर कि अछूत लोग ईसाई धर्म अपना लें, टिप्पणी करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने निम्नलिखित विचार व्यक्त किया था :