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हिन्दुत्व में कमियां
अछूतों का चिंतक वर्ग इससे आश्वस्त है कि इस समय विद्यमान हिन्दुत्व अछूतों को आध्यात्मिक प्रकार का तालमेल और सामाजिक समरसता प्रदान नहीं करता, जैसाकि इस धर्म द्वारा लोगों को देना आशयित है।
’’दूसरे, अनुसूचित जातियों के चिंतक वर्ग की राय है कि मनुष्यों को वैसे उखाड़ना आसान नहीं है जैसे कोई पौधा एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जा सकता हे। यह एक कठिन काम है और इसे साहसिक कार्य नहीं माना जा सकता। एक सुनियोजित कार्रवाई करनी होगी जिसके बनाने और कार्यरूप देने में समय लगेगा।
’’तीसरे, अछूत लोग यह महसूस करते हैं कि संभवतः, हालांकि उनकी इस विषय में घोर आशंकाएं हैं, - हिन्दुत्व कालांतर में, अपने में इतना सुधार करे कि वह स्वीकार्य हो जाए, इसीलिए अछूत लोग यथावत बने रहने को तैयार हैं, बशर्ते कि इस बीच अस्पृश्यों को इतने राजनीतिक रक्षोपाय मिल जाएं जिससे हिन्दुत्व में अंतर्निहित क्रूरता, उत्पीड़न और अन्याय का मुकाबला किया जा सके जिसके शिकार ये इन सब युगों में रहे हैं और उन्हें आशंका है कि यदि अंतिम राजसत्ता बहुसंख्यक हिन्दुओं के हाथों में रही तो वे और भी अधिक कष्ट भोगेंगे। भारत के पूरी तरह स्वाधीन होने पर यही स्थिति होगी। यदि हिन्दू इस स्थिति को मानने से इंकार करते हैं और अस्पृश्यों को राजसत्ता नहीं देते हैं, जो वे चाहते हैं, तो मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अछूतों द्वारा कोई धर्म ग्रहण किया जाना एक आपातकालिक मुद्दा बन जाएगा।
अछूतों के लिए कौन सा धर्म ?
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’’चौथे, यद्यपि अनुसूचित जातियों का चिंतक वर्ग हिन्दू धर्म छोड़ने को राजी है फिर भी मैं यह नहीं कह सकता कि इस बारे में कोई पूर्ण सहमति है कि कौन-सा धर्म अपनाया जाए। यह विषय अभी अंतिम रूप से निश्चित नहीं हुआ है।
’’अंततः, क्या ईसाइयों को 50,000,000 अछूतों को प्रारंभिक प्रशिक्षण काल के बिना अपने समाज में स्वीकार कर लेना चाहिए (जैसाकि पूज्य लिविंग्सटन का सुझाव था) इस बारे में, मैं यह कहना चाहूंगा कि जो लोग इस पर आपत्ति करते हैं वे यह समझते नहीं लगते कि अछूतों का धर्मान्तरण वास्तविक धर्मान्तरण के इतिहास में एकमात्र दृष्टांत होगा। आज ईसाइयों और गैर-ईसाइयों में धर्म केवल विरासत का