21
‘‘सामाजिक निःशक्तताओं के उन्मूलन हेतु डॉ. अम्बेडकर का तर्क
25 दिसम्बर, 1927 को महाद (जिला कोलाबा) में हुए सत्याग्रह सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर एम.ए., पीएचडी, डीएससी, बार-एट-लॉ, एमएलसी, के अध्यक्षीय भाषण का सारांश :
सत्याग्रह समिति, जिसके वे अध्यक्ष हैं, की ओर से सत्याग्रहियों का स्वागत करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने उन्हें पिछली मार्च को उसी स्थान पर हुए सम्मेलन के दुर्भाग्यपूर्ण अंत की याद दिलाई जब चौदार नामक सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के अपराध के लिए उनके बहुत से साथी प्रतिनिधियों के साथ तथाकथित सवर्ण हिन्दुओं द्वारा दुर्व्यवहार किया गया था और उन पर हमला किया गया था। दलित वर्गों के सदस्यों को तालाब के पानी का उपयोग करने से किसी ने नहीं रोका परंतु उक्त घटना के बाद कुछ सरगनाओं को सनक सवार हो गई कि सम्मेलन के प्रतिनिधियों को दंडित किया जाए और उन्होंने भीड़ को भड़काया कि उनपर हमला किया जाए। कुछ अपराधियों पर मुकदमा चलाया गया, उनको दोषी पाया गया और उन्हें चार महीने की कैद की सजा हुई।
अपना भाषण जारी रखते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा : ‘‘यदि सवर्ण हिन्दुओं ने तालाब का प्रयोग करने के दलित वर्गों के अधिकार को स्वीकार कर लिया होता, तो यह सत्याग्रह आवश्यक नहीं होता। तथापि, दुर्भाग्यवश, इस विषय पर सवर्ण हिन्दू अपने रुख में जिद्दी हैं और वे सार्वजनिक तालाब, जो मुसलमानों और अन्य गैर-हिन्दुओं सहित सभी जातियों के लोगों के लिए खुला है, का प्रयोग करने के दलित वर्गों के अधिकार को मानने से इंकार करते हैं। स्थिति की विडम्बना यह है कि यद्यपि तथाकथित अछूतों के पशुओं को तालाब पर जाने दिया जाता है, तथापि उनके मालिकों को, जो अन्य लोगों के समान ही अच्छे मनुष्य हैं, तालाब पर जाने की मनाही है।
हिन्दुओं को उनकी मानवतावादी भावनाओं के लिए जाना जाता है और पशु जीवन के लिए उनकी चिन्ता लोकप्रसिद्ध है। कुछ वर्ग जहरीले रेपटाइल्स तक को भी नहीं मारते। हिन्दू बहुत से साधुओं और हृष्ट-पुष्ट भिखारियों का भरण-पोषण करते हैं तथा यह विश्वास करते हैं कि उनको भोजन और वस्त्र देकर तथा सुख-साधनों का सेवन करने के लिए नकद धन देकर वे पुण्य प्राप्त करते हैं। हिन्दू दर्शन सर्वव्यापी आत्मा के सिद्धांत की शिक्षा देता है और गीता उन्हें ब्राह्मण और चांडाल के बीच भेदभाव न करने का उपदेश देती है।
अतः प्रश्न उठता है कि हिन्दुओं की दान और मानवता की ऐसी परम्पराएं