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अस्पृश्यों के लिए पर्याप्त रक्षोपाय किए जाएं
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने जोगेन्द्र नाथ मंडल को संबोधित पत्र में अनुसूचित जातियों के रक्षोपायों के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं। वह पत्र निम्न प्रकार हैं - संपादक
गोपनीय
भीमराव आर. अम्बेडकर राजगढ़
एम.ए., पीएच.डी., डी.एससी. दादर बम्बई-14
बैरिस्टर-एट-लॉ बम्बई, 2 जून, 1947
प्रिय मंडल,
तारीख 30 मई, 1947 का आपका पत्र मुझे श्री मेशराम द्वारा कल दिया गया था। अफसोस है कि पिछला पूरा महीने मैं बाईं टांग में भयंकर दर्द के कारण बिस्तर पर पड़ा रहा और सार्वजनिक कार्यों में कोई सक्रिय रुचि नहीं ले सका। मैं संघीय संविधान समिति जिसमें मुझे नियुक्त किया गया है, में भाग लेने के लिए 4 तारीख को दिल्ली विमान से आना चाहता हूं। लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि मैं कितना चल पाता हूं। यदि डाक्टरों ने न चलने की सलाह दी तो मैं बंगाल विभाजन के सवाल पर अपने विचार आपकी जानकारी में लाऊंगा।
मैंने हमेशा महसूस किया है कि अंग्रेजों ने अनुसूचित जातियों को एक पृथक और स्वतंत्र पार्टी मानने से इंकार किया है। अनुसूचित जातियां विभाजन के सवाल के बारे में निश्चित तौर पर कुछ करने में असमर्थ हैं। वे न तो विभाजन करने को बाध्य कर सकती है और न ही विभाजन को रोक सकती हैं। अनुसूचित जातियों के सामने एक ही रास्ता है कि वे एकीकृत बंगाल में अथवा विभाजित बंगाल में अपने रक्षोपायों के लिए संघर्ष करें। मेरा भी यही मत है कि मुसलमान अनुसूचित जातियों के हिन्दुओं से बड़े मित्र नहीं हैं और यह कि यदि अपनी स्वयं की परिस्थितियों के अंतर्गत अनुसूचित जातियों की नियति अल्पसंख्या में रहना है तो चाहे हिन्दू बंगाल