22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तथा इतना शानदार दर्शन होने पर भी उनको अपने साथी मनुष्यों के साथ इतना निर्दयतापूर्ण और ऐसा अनुचित व्यवहार क्यों करना चाहिए। इस प्रश्न के उत्तर में ही इस सम्मेलन का वास्तविक महत्व निहित है। हिन्दू समाज जाति-प्रथा के सांचे में स्थिर है, जिसमें सामाजिक वर्गीकरण के कारण एक जाति दूसरी जाति से नीचे है, जिसमें प्रत्येक जाति के संबंध में विशिष्ट विशेषाधिकार, अधिकार, निषेध और निःशक्तताएं अंतर्ग्रस्त हैं। इस प्रथा ने निहित स्वार्थ उत्पन्न किए हैं जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि उक्त प्रथा के परिणामस्वरूप जो असमानताएं पैदा हुई हैं उन्हें कायम रखा जाए।
तथाकथित सवर्ण हिन्दू पंचमस (पांचवे वर्ग, दलित वर्ग से संबंध रखने वाला व्यक्ति) द्वारा सार्वजनिक तालाब का उपयोग करने के सख्त खिलाफ हैं, इसलिए नहीं कि वे वास्तव में विश्वास करते हैं कि यदि महार और अन्य लोग तालाब का उपयोग करेंगे तो उससे पानी खराब हो जाएगा या भाप बन जाएगा, बल्कि इसलिए कि वे जाति की श्रेष्ठता को खोने से और सवर्ण हिन्दुओं तथा दलित वर्गों के बीच समानता हो जाने से डरते हैं। हम इस सत्याग्रह का आश्रय इसलिए नहीं ले रहे हैं कि हम यह मानते हैं कि इस विशिष्ट तालाब के पानी में असाधारण गुण हैं, बल्कि नागरिकों और मानवों के रूप में अपने प्राकृतिक अधिकारों को स्थापित करने हेतु ऐसा कर रहे हैं।
बराबरी के लिए संघर्ष
यह सम्मेलन बराबरी के झंडे को फहराने के लिए आयोजित किया गया है और इस प्रकार इसकी तुलना फ्रांस में 1789 में आयोजित नेशनल एसेम्बली से की जा सकती है। हमारे सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक, धार्मिक, नागरिक और आर्थिक मामलों में समान उपलब्धि का है। हम प्रकट रूप से जाति प्रथा के कठोर सांचे को तोड़ना चाहते हैं।
छोटा उद्देश्य अपराध है
कुछ लोग कह सकते हैं कि जाति प्रथा को छोड़कर, केवल अस्पृश्यता के उन्मूलन से ही संतुष्ट हो जाना चाहिए। जाति प्रथा में अंतर्निहित असमानताओं के उन्मूलन की कोशिश किए बिना केवल अस्पृश्यता के उन्मूलन का ही उद्देश्य बहुत छोटा उद्देश्य है। हमें याद रखना चाहिए कि ‘‘असफलता नहीं बल्कि छोटा उद्देश्य अपराध है।’’ हम इस बुराई की जड़ों तक जांच करें और हम अपने दर्द को कम