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(4) (क) यह एक कड़वा सच है कि सिख और जाट, जिनका पूर्वी पंजाब में बहुत प्रमुख स्थान है, उन अनुसूचित जातियों को जो पूर्वी पंजाब के निवासी हैं, उनके मूल मकान खाली करने के लिए मजबूर कर रहे हैं ताकि उनके मकानों और जमीनों को अपने कब्जे में लिया जा सके। अनुसूचित जातियां सिखों और जाटों के अत्याचार और उत्पीड़न से छुटकारा पाने में असमर्थ हैं। इसका कारण यह है कि पूर्वी पंजाब में मजिस्ट्रेट और पुलिस पूरी तरह सिख और जाट हैं जो एकदम स्वभावतः दोषियों की रक्षा करते हैं, क्योंकि वे उनके निकट संबंधी हैं, और वे अनुसूचित जातियों की शिकायतों पर ध्यान नहीं देते।
(ख) इसलिए यह नितांत अनिवार्य है कि पूर्वी पंजाब की सरकार को सिविल पुलिस में अनुसूचित जाति के कम से कम 300 व्यक्तियों की भर्ती करने के लिए बाध्य किया जाए। हाल ही में, अखबारों में छपा है कि पूर्वी पंजाब सरकार ने अपने पुलिस बल में अनुसूचित जाति के कोई 300 लोगों को भर्ती किया है। पूछताछ करने पर पता चला कि यह भर्ती सीमा सुरक्षा बल के प्रयोजनार्थ की गई है न कि साधारण सिविल पुलिस बल के लिए। अनुसूचित जातियों को अपनी रक्षा के प्रयोजनार्थ पूर्वी पंजाब की सिविल पुलिस में भर्ती चाहिए। मुझे ज्ञात हुआ है कि पूर्वी पंजाब के सिविल पुलिस बल में अनुसूचित जाति का एक भी व्यक्ति भर्ती नहीं किया गया है।
(5) (क) पूर्वी पंजाब की भू-राजस्व व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम वासियों को दो वर्गों अर्थात् जमींदारों और कमीनों में बांटा गया है। जमींदारों के प्रवर्ग में, वे परिवार शामिल हैं जिन्हें गांव की सीमा के अंदर स्थित भूमि पर अनन्य मालिकाना हक है। कमीनों को अपने गांव में स्थित जमीन खरीदने या मालिक बनने का अधिकार नहीं है। जिस जमीन पर उनके मकान बने हैं वह भी जमींदारों की है। इसके परिणामस्वरूप, सब जमींदार मिलकर कमीनों को मकान गिराकर गांव छोड़ने के लिए बाध्य कर सकते हैं। इस नियम के अनुसार हर गांव के कमीन लोग जमींदारों की कृपा पर रहते हैं। पूर्वी पंजाब में सभी गांवों में अनुसूचित जातियों को कमीनों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसलिए वे पूरी तरह गांव के जमींदारों की चाकरी करते हैं।