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मई 1950 में एक सुहावनी शाम को दो आदमी बम्बई के कफ परेड मैदान में एक बैंच पर बैठे आपस में बात-चीत रहे थे। उनमें से एक थे भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर और दूसरे थे ’द अनटचेबल्स’ के लेखक विद्वान साहित्यकार डॉ. मुल्कराज आनन्द।
चालीस वर्ष बाद डॉ. आनन्द दलितों के मसीहा के साथ हुई उस ज्ञानवर्धक बातचीत को याद करते हैं :-
मुल्क राज आनन्द : नमस्कार, डॉ. अम्बेडकर
बी. आर. अम्बेडकर : मुझे बौद्ध अभिवादन पसन्द है -ओम मणि पद्मये!
अर्थात् गुलाब खिल उठें।
मुल्कराज आनन्द : मैं सहमत हूं। हम सोचते ही नहीं। हम अर्थ सोचे
बिना ही शब्दों को विरासत में ग्रहण कर लेते हैं।
निःसंदेह, नमस्कार का अर्थ है - मैं आपके समक्ष
नमन करता हूं....,
बी. आर. अम्बेडकर : इससे समर्पण शाश्वत हो जाता है। ओम् मणि
पदमये ज्योति के लिए प्रार्थना है।
मुलकराज आनन्द : वास्तव में, पुरानी आदतें आसानी से नहीं छूटतीं।
हम उन्हें बिना सोचे-समझे अपना लेते हैं।
बी. आर. अम्बेडकर : हर चीज में।
मुल्कराज आनन्द : आइए, सोचें, कोई हिन्दू! मुसलमान ! या ईसाई
! ठप्पा लगाकर तो पैदा नहीं होता। हिन्दू
माता-पिता अपने बच्चे को नामकरण अनुष्ठान में
एक नाम देते हैं जिसे पुजारी पंडित संस्कृत श्लोक
पढ़कर शुद्ध करते हैं जिसे वह बच्चा समझता नहीं
है। उसके शरीर पर (जनेऊ) पवित्र धागा पहना
दिया जाता है। और देखिए वह बच्चा हिन्दू बन
जाता है।