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करने वाली बातों से ही संतुष्ट न हों। यदि बीमारी का ठीक तरह से निदान नहीं किया जाए तो उपचार व्यर्थ होगा तथा उसको स्थगित किया जा सकता है।
केवल छुआछूत और अंतर्जातीय खान-पान के प्रतिबंधों को ही दूर न किया जाए बल्कि विभिन्न जातियों के हिन्दुओं में अंतर्विवाहों को आम बना दिया जाना चाहिए। केवल इसी बात से सच्ची समानता स्थापित होगी। मान लीजिए कि अस्पृश्यता का कलंक भी मिटा दिया जाता है, तो भी वर्तमान अछूतों की स्थिति क्या होगी। अधिक से अधिक उनसे ‘‘शूद्रों’’ के रूप में व्यवहार किया जाएगा। ‘‘शूद्रों’’ के अधिकार क्या हैं? ‘‘स्मृतियां’’ उन्हें केवल कट्टर समर्थक मानती हैं और जाति प्रथा में पदक्रम के मामले में ‘‘स्मृतियां’’ ही सवर्ण हिन्दुओं की मार्गदर्शक हैं। क्या आप अपने साथ ‘‘शूद्रों’’ जैसा व्यवहार किए जाने के लिए तैयार हैं? क्या आप कट्टर समर्थकों की स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? क्या आप अपने भाग्य को उच्च वर्ग के हाथों में छोड़ने के लिए तैयार हैं?
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यह सर्वविदित है कि यदि हिन्दू समाज का समानता के आधार पर पुनर्गठन करना है, तो जाति प्रथा समाप्त की जानी चाहिए। अस्पृश्यता की जड़ें जाति व्यवस्था में हैं। वे ब्राह्मणों से यह आशा नहीं कर सकते कि वे जाति व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करें, क्योंकि यह व्यवस्था उनको कुछ विशिष्ट विशेषाधिकार देती हैं और वे पदानुक्रम में अपनी विशिष्ट स्थिति और वर्तमान सर्वोच्चता को स्वेच्छा से नहीं छोड़ेंगे। उनसे यह आशा करना बहुत अधिक होगा कि वे अपने सभी विशेषाधिकारों को छोड़ दें जैसा कि जापान के ‘‘समुराइयों’’ ने किया था। हम गैर-ब्राह्मणों पर भी विश्वास नहीं कर सकते, और उनसे अपनी लड़ाई लड़ने को नहीं कह सकते। उनमें से बहुत से तो अभी भी जाति व्यवस्था के प्रति आसक्त हैं और ब्राह्मणों के हाथों की कठपुतलियां हैं, इन अन्य लोगों में से अधिकतर लोग, जो ब्राह्मणों की सर्वोच्चता से अप्रसन्न हैं, दलित वर्गों के स्तर को ऊंचा उठाने की बजाए ब्राह्मणों के स्तर को नीचा करने में अधिक रुचि रखते हैं, वे भी चाहते हैं कि लोगों का एक ऐसा वर्ग हो जिसको वे तुच्छ समझ सकें तथा उन्हें यह संतोष हो कि वे समाज के नितांत अभागे व्यक्ति नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि हमें स्वयं पर विश्वास करते हुए अपनी लड़ाइयां अपने आप ही लड़नी चाहिएं। हम देश में सर्वाधिक पददलित वर्ग हैं। सेना, पुलिस और सार्वजनिक कार्यालयों में हमारे लिए नौकरियां विशेष रूप से बंद हैं, हम पर अनेक व्यापारों और पेशों को अपनाने पर प्रतिबंध है और हमें आर्थिक रूप से नितांत कमजोर बना दिया गया है। यह सब अस्पृश्यता और सबसे