44. अपना प्रकाश स्वयं बनें। - Page 394

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और किंवदंतियाँ। कोई भी व्यक्ति ज्ञान अन्वेषण

कर सकता है। कोई भी आदमी विष्णु के अवतार

भगवान राजा राम जैसे हिन्दुओं के सवर्ण नायकों

को मानने से इंकार कर सकता है। और अन्य

अनेक हिन्दुत्व की भावात्मक पौराणिक कथाएं।

मुल्कराज आनन्द : वास्तव में, मैं ब्राह्मणों के अनुमानों की तुलना में

बुद्ध के उद्धारों को कहीं ज्यादा चिंतनीय मानता

हूं। वह विश्व के पहले अस्तित्ववादी थे। उन्होंने

दुखी होकर कहा था - दुःख, दुःख, दुःख, ! हिन्दू

हमेशा पारंपरिक विश्वासों पर चलते हैं। ईश्वर

आनन्द है। उन याचकों के लिए सांत्वना पुरस्कार

जो पुष्पों के उपहारों, फूल मालाओं और फलों की

रिश्वत पुजारियों की मार्फत देकर सामंती भगवान

से वरदान मांगते हैं।

बी. आर. अम्बेडकर : यही वजह है कि ज्यादातर पुजारियों का पेट मोटा

होता है।

मुल्कराज आनन्द : बहिष्कृतों के लिए आपका क्या संदेश है ?

बी. आर. अम्बेडकर : मैं अछूतों से कहता हूं ; शेर बनकर रहो; हिन्दू

काली की मूर्ति के सामने बकरी की बलि देते हैं।

अपनी रोशनी खुद बनो अर्थात् ’अत्तदीप भव !’

मुल्कराज आनन्द : जैसे बुद्ध ने आनन्द से कहा था - अपना दीप

स्वयं बनो ! ..................’’ ख्1,

  1. ’द अनटचेबुल्स’ के प्रख्यात लेखक और रचनाकार डॉ. मुल्क राज आनंद - ट्राईबल वर्ल्ड, अप्रैल, 1991, पृ. 13. पुनर्मुद्रित, रटटू, रिमेम्ब्रेन्सेज ऑफ डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, पृ. 110-114।