382 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जायेगा जहाँ यह लागू नहीं होता तथा जहाँ यह अमान्य है वहाँ इस की
बहाली की जायेगी।
(2) इसमें प्रत्येक भारतीय को स्वयंसिद्ध माना जाएगा और उसे अपनी स्वयं
की कार्य-प्रणाली से अपने विकास का अधिकार होगा और राज्य केवल
उसके विकास का साधन होगा।
(3) ऐसी कोई प्रतिबद्धता उत्पन्न न हो - सीमितताओं के अध्यधीन यह पार्टी
प्रत्येक भारतीय के धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक अधिकार की स्वतंत्रता
का संरक्षण करेगी, बशर्ते अन्य भारतीयों या राज्य के हितों के संरक्षण के
लिए।
(4) यह प्रत्येक भारतीय के अवसर की समता का संरक्षण इस प्रावधान की
शर्त पर करेगी कि जिनके पास पूर्व में कोई अवसर नहीं था, उसे उन
पर प्राथमिकता दी जायेगी जिनके पास पूर्व में अवसर थे।
(5) यह प्रत्येक भारतीय को अभाव और भय से मुक्त रखने के राज्य के दायित्व
के प्रति राज्य को जागरूक बनाए रखेगी।
(6) यह स्वतंत्रता, समानता और मैत्री को बनाये रखने पर बल देगी तथा
मनुष्य को मनुष्य द्वारा, एक वर्ग को दूसरे वर्ग द्वारा तथा एक राष्ट्र को
दूसरे राष्ट्र द्वारा किये जाने वाले दमन एवं शोषण से छुटकारा दिलवाने
का प्रयास करेगी।
(7) यह जनहित तथा वैयक्तिक हित में सरकार की सर्वोत्तम प्रणाली के रूप
में सरकार की संसदीय प्रणाली का समर्थन करेगी।
इन सिद्धान्तों के आशय एवं सत्यनिष्ठा का आकलन करने के लिए दो बातें हैं जिन्हें अपने मस्तिष्क में रखा जाना चाहिए। पहला विचार यह है कि संघ द्वारा इन सिद्धान्तों को भारत में उत्पीडि़त मानवता के लाभ के लिए अपनाया गया है। इस अभिमत से संघ को साम्प्रदायिक संगठन होने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा भी हो सकता है कि यह सभी के लिए उपयोगी न हो तथापि वह सभी के लिए लाभप्रद होगा और उन सभी का सहयोग करेगा जो सहयोग के लिए उपयुक्त होंगे।
हो सकता है कि अनुसूचित जाति संघ के सिद्धान्तों में कुछ भी नया न हो। ये बातें अधिकतर राजनैतिक दलों के घोषणा-पत्रों में मिल जायेंगे। परन्तु यहाँ दो तर्क हैं जो संघ को अन्य राजनैतिक दलों से अलग करते हैं। पहला तर्क यह है कि