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संघ द्वारा सिद्धान्तों को केवल इसलिए नहीं अपनाया गया है कि वे राजनैतिक दृष्टि से सम्मानजनक दिखे या मतदाताओं को प्रलोभित करें। ये संघ के लिए स्वाभाविक है। ये अनुसूचित जातियों की सामाजिक दशा से उद्भूत हुये हैं। इन सिद्धान्तों को स्वीकार किये बिना और उनके अनुरूप बने रहने के सिवाय कोई अस्तित्व नहीं है। अनुसूचित जाति संघ के सिद्धान्त अनुसूचित जाति संघ के लिए धर्मग्रन्थ के रूप में हैं। राजनीतिक निष्ठा के दिखावटी आदर्श नहीं हैं। ये अन्तःकरण की भावना को उजागर करते हैं। ये एक ऐसा लबादा नहीं है, जिसे चुनाव जीतने के उद्देश्य से ओढ़ा जाये। कई दल इन सिद्धान्तों को स्वीकार कर सकते हैं। परन्तु कोई दल सिद्धान्तों के प्रति इतना निष्ठावान नहीं हो सकेगा जितना कि अनुसूचित जाति संघ होगा। संघ के सिद्धान्तों का मूल्यांकन करने के लिए यह दूसरा तर्क है।
दल की नीति
दल की नीति उपरोक्त निश्चित किये गये सिद्धान्तों को कार्यान्वित करने का प्रयास करना है। दल की नीति किसी विशेष रूढि़वादी परम्परा या साम्यवाद या समाजवाद, गाँधीवाद जैसी विचारधारा या किसी अन्य वाद से नहीं जुड़ी हुई है। दल अपने मूल उद्भव का भेद किये बिना सामाजिक एवं आर्थिक बेहतरी की किसी भी योजना को स्वीकार करने के लिए तैयार रहेगा बशर्ते कि वह इसके सिद्धान्तों के अनुरूप हो। इस का दृष्टिकोण पूर्णतया न्यायोचित, और आधुनिक, तथा अनुभव जन्य होगा न कि सद्धांतिक मात्र। 1- पुरानी समस्यायें
भारत में किसी भी राजनीतिक दल के कार्यक्रम आवश्यक रूप से अंग्रेजों द्वारा स्थापित सिद्धांतों के साथ अभिन्न रूप से जुड़े होने चाहिएं। अंग्रेजों के सिद्धांतों के सराहनीय पक्ष है और साथ ही इसके असराहनीय पक्ष भी हैं। सराहनीय पक्ष होंगे (1) कानून की एक समान प्रणाली, (2) न्याय की एक समान प्रणाली, (3) समरूप प्रणाली एवं प्रशासन। असराहनीय पक्ष हैं, (1) देश के लोगों में प्रचलित प्राचीन सामाजिक परम्परा को बनाये रखना, (2) शिक्षा तथा सेवा-सिविल एवं सेना दोनों में विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को बनाये रखना, (3) अस्पृश्नीय पिछड़ी जातियों एवं जनजातीय लोगों की पूर्ण उपेक्षा, (4) देश की दरिद्रता, आदि।