24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
निचली सामाजिक स्थिति, के कारण जिसमें हमें धकेल दिया गया है। यदि हम मानवों और नागरिकों के रूप में अपने अधिकारों पर दृढ़ रहने में असफल होते हैं, तो हमें हमेशा के लिए पतित रहना होगा।
राष्ट्र की सच्ची सेवा
हमारा एक ऐसा आंदोलन है जिसका उद्देश्य न केवल हमारी स्वयं की निःशक्तताओं को दूर करना है, बल्कि एक सामाजिक क्रांति भी लाना है, एक ऐसी क्रांति जो सबको सबसे ऊंचे पद तक उन्नति करने के समान अवसर देकर और जहां तक नागरिक अधिकारों का संबंध है, एक मानव से दूसरे मानव के बीच भेद न करके, मानव-निर्मित जातिगत सभी बाधाओं को दूर करेगी। यदि हम सभी हिन्दुओं को एक ही जाति में संगठित करने के अपने आंदोलन में सफलता प्राप्त करते हैं तो हम सामान्यतः भारतीय राष्ट्र की, विशेषकर हिन्दू समाज की सबसे बड़ी सेवा करेंगे। वर्तमान जाति व्यवस्था अपने पक्षपातपूर्ण भेदभाव और अनुचित विधान के कारण हमारी सामाजिक तथा राष्ट्रीय कमजोरी के सबसे बड़े स्रोतों में से एक स्रोत है। हमारा आंदोलन बल और एकता, समानता, स्वाधीनता तथा भ्रातृत्व के लिए है। हम अपने आंदोलन को उतने शांतिपूर्ण ढंग से जारी रखना चाहते हैं जितना कि हम रख सकते हैं। तथापि, अहिंसक बने रहने का हमारा निश्चय बहुत सीमा तक हमारे विरोधियों के रुख पर निर्भर रहेगा। हम आक्रामक नहीं हैं और पीढि़यों तक हमारे तानाशाह रह चुके लोग यदि हम पर आक्रमण का दोषारोपण करें तो यह एक विचित्र बात है। हम अंधकारपूर्ण युग में लिखे गए ‘‘शास्त्रों’’ और ‘‘स्मृतियों’’ से नियंत्रित और आबद्ध होने से इंकार करते हैं तथा अपने दावों को न्याय और मानवता पर आधारित करते हैं।’’ ख्1,
तत्पश्चात् एक ब्राह्मण श्री जी.एन. सहस्त्रबुधे ने मनुस्मृति से उद्धरणों के वे अंश पढ़े जो शूद्रों के साथ किए जाने वाले व्यवहार के विषय में थे।
| Col1 | Col2 |
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| kn |
मनुस्मृति को जलादो
पहला पारित संकल्प निम्नलिखित रूप में था :-
मनुस्मृति और ऐसी अन्य पुस्तकों में दी गई टिप्पणियाँ, जो बहुत ही अशिष्ट हैं और जो अत्यधिक स्पष्ट रूप से मानवाधिकारों का उल्लंघन करती हैं, को ध्यान में
- द इंडियन नेषनल हेराल्ड, दिनांक 28 दिसम्बर, 1927।