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8(7) योजना आयोग ने भारत की आर्थिक दशा का वर्णन बहुत ही यथार्थवादी शब्दों में किया है। उसका कहना है :-
( i ) भारतीय संघ (जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर) की जनसंख्या वर्ष 1901 में
235.5 करोड़ से बढ़कर वर्ष 1951 में 356.9 करोड़ हो गई - पचास वर्षों में
लगभग 52 प्रतिशत की वृद्धि। प्रथम दो दशकों में वृद्धि की दर अपेक्षाकृत
कम थी, परन्तु इसके बाद वह बढ़ती गई। वर्ष 1921 एवं 1931 के मध्य
वृद्धि 11 प्रतिशत थी, 1931-41 में यह 14.3 प्रतिशत और 1941-51 में यह
13.4 प्रतिशत रही थी।
( ii ) उद्योगों में पर्याप्त विकास होने के बावजूद व्यावसायिक संरचना में बहुत
कम परिवर्तन हुआ है। वर्ष 1911 में लगभग 71 प्रतिशत कार्यशील
जनसंख्या कृषि से जुड़ी हुई थी। वर्ष 1948 के लिए राष्ट्रीय आय समिति
ने इन आंकड़ों को लगभग 68.2 प्रतिशत बताया है। कृषि से वर्ष में कुछ
ही दिनों के लिए रोज़गार प्राप्त होता है। इसलिए इस व्यवसाय से जुड़े
अधिकतर लोग वर्ष के शेष दिनों में प्रायः बेकार ही रहते हैं। इस प्रकार
देश में अपूर्ण रोज़गार की दीर्घकालिक समस्या है।
( iii ) प्रति व्यक्ति बुवाई क्षेत्र में लगातार गिरावट की प्रवृत्ति दर्शाई गई है।
ब्रिटिश-भारत में प्रति व्यक्ति बुवाई का क्षेत्र 1911-12 में 0.88 एकड़ से
घटकर वर्ष 1941-42 में 0.72 एकड़ हो गया था। विभाजन के पश्चात्
वर्ष 1948 में भारतीय संघ में प्रति-व्यक्ति बुवाई का क्षेत्र अनुमानित रूप में
0.71 एकड़ निकाला गया। प्रति एकड़ उपज की प्रवृत्ति के प्रमाण निश्चित
नहीं हैं। तथापि कुछेक उपलब्ध प्रकाशित आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि
कुछ खाद्य-पफसलों के संबंध में गिरावट का प्रवृत्ति बनी हुई है। कृषि की
उत्पादकता के समस्त रूझानों का आकलन कठिन है परन्तु विस्तृत चित्र जो
उभर कर आता है, उससे ज्ञात होता है कि स्थिति स्थिर बनी हुई है।
- इस प्रकार गरीबी एक द्विआयामी समस्या है। एक ओर यह कृषि एवं उद्योग दोनों में अधिक उत्पादन करने की समस्या है। दूसरी ओर यह जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि को नियंत्रित करने की समस्या है। दोनों ही पक्ष समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। अनुसूचित जाति संघ दोनों मोर्चों पर गरीबी के विरुद्ध संघर्ष करने का प्रस्ताव करता है।