46. अनुसूचित जाति का उद्धार घोषणा-पत्र का प्रारूप - Page 404

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  1. इस योजना को स्वीकार कर इस पर कार्य करना साधारण किसान के लिए संभव नहीं है। उसके पास योजना की लागत को वहन करने का कोई साधन नहीं है। अनुसूचित जाति संघ का मत है कि इन योजनाओं का कार्यान्वयन राज्य द्वारा किया जाना चाहिए। इस योजना का प्रथम तत्व राज्य का उत्तरदायित्व होना चाहिए। राज्य द्वारा किसान को सभी मशीनीकृत उपकरणों की आपूर्ति किराये पर की जानी चाहिए और इसकी वसूली भू-राजस्व के साथ की जाए।

  2. अनेक छोटे जोतक्षेत्रों से बड़े पैमाने पर फार्मों के सृजन में अत्यधिक समस्या आती है। परन्तु सहकारी खेतों या सामूहिक खेतों की शुरूआत कर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

  3. यद्यपि भारत एक कृषि प्रधान देश है, यहाँ पर बहुत अधिक संख्या में लोग हैं जो केवल भूमिहीन मजदूर हैं, जो दयनीय स्थिति में जीवन निर्वाह कर रहे हैं तथा किसानों द्वारा शोषित हो रहे हैं और इनमें से अधिकांश अस्पृश्य एवं अन्य पिछड़ी जातियों से हैं। ऐसे भूमिहीन मज़दूरों को उनकी नियति पर क्यों छोड़ दिया जाए जिससे उनकी दुर्दशा होती रहे और देश में गरीबी फैले। यह अत्यन्त खेदजनक है क्योंकि यह ऐसी स्थिति नहीं है जिसका निवारण न किया जा सके। इस संबंध में भारत में उपलब्ध भूमि से संबंधित निम्न आँकड़े निर्देशात्मक हैं :

इन आँकड़ों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि 93 मिलियन एकड़ भूमि ऐसी है जो कि कृषि योग्य परंतु बेकार भूमि है, जिस पर खेती की जा सकती है। निश्चित रूप से यह आधुनिक विज्ञान की सीमा से बाहर नहीं है कि इस बहुत बड़ी खेती योग्य बेकार भूमि को प्राप्त कर खेती के लिए उपलब्ध कराया जाए। अनुसूचित जाति संघ इस प्रश्न का हल ढूंढेगी।