388 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किसानों की समृद्धि देश में फैले वन-प्रदेशों के रखरखाव पर निर्भर होनी चाहिए। वन-प्रदेशों के बिना उचित मात्रा में वर्षों को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है और भारत में कृषि हमेशा पूर्व की भांति वर्षा पर ही निर्भर रहेगी। संघ हमेशा अकृष्य बेकार भूमि पर वृक्षारोपण पर बल देता रहेगा।
सूक्ष्म अर्थों में कृषि कभी भी लाभकारी कारोबार नहीं हो सकता है। इसे सहकारी उद्योगों, जिन्हें कुटीर उद्योग कहा जाता है, के साथ जोड़ा जाना चाहिए। परन्तु कोई भी योग्य कुटीर उद्योग विद्युत की पर्याप्त आपूर्ति के बिना संभव नहीं हो सकता। अनुसूचित जाति संघ की राय में विद्युत का उत्पादन भारत की आर्थिक समृद्धि की नींव है और अनुसूचित जाति संघ नदी घाटी परियोजना के कार्यान्वयन के लिए प्रयास करेगा, जिसका उद्देश्य सिंचाई की व्यवस्था करना, विद्युत उत्पादन करना और बाढ़ों को रोकना है।
जिस प्रकार भूमि की उपेक्षा हुई है, उसी प्रकार भूमिहीन मज़दूर भी उपेक्षित रहे हैं। संघ, बिना जुताई वाली भूमि या खेती योग्य बनाई गई भूमि में से भूमिहीन मज़दूरों के लाभ के लिए भूमि आरक्षित करेगा और उनके लिए न्यूनतम मज़दूरी का सिद्धान्त भी लागू करेगा।
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नई समस्यायें
- अब तक घोषणा-पत्र में उस पक्ष को रखा गया है जिसमें अनुसूचित जाति संघ उन पुरानी समस्याओं के समाधान का प्रस्ताव करता है जिन्हें अंग्रेज भारत में बपौती के रूप में छोड़ गये हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् नई समस्याएँ उभर कर आई हैं। इन्हें दो भागों में विभाजित किया गया हैं :-
(क) आंतरिक प्रशासन की समस्याएँ, और
(ख) विदेशी सम्बन्धें की समस्याएँ।
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क. आतंरिक प्रशासन की समस्याएँ
- आंतरिक प्रशासन की महत्त्वपूर्ण समस्याएँ निम्नलिखित हैंः-
( I ) भाषायी प्रांतों की समस्या;
( II ) प्रशासन में विशुद्धता की बहाली की समस्या;
( III ) नियंत्रण एवं कालाबाजारियों की समस्या;