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के मध्य वर्तमान में मतभेद होने के परिणामस्वरूप भारत के लिए अमेरिका से वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्राप्त करना असंभव हो गया है।
हमने स्वतंत्र उपनिवेश के दर्जे को अस्वीकार किया था। हमारा देश एक स्वतंत्र देश बन गया है। तत्पश्चात् ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल में बने रहने के लिए सहमति दी है, फिर भी हमारे संबंध अन्य देशों के साथ मैत्रीपूर्ण नहीं है।
हम अपनी विदेश नीति में पूँजीवादी एवं संसदीय प्रजातंत्र में अन्तर करने में समर्थ नहीं है। पूँजीवाद के प्रति विमुखता समझ में आती है। परन्तु हमें ध्यान रखना है कि हम अपने संसदीय प्रजातंत्र को कमजोर होने तथा तानाशाही को बढ़ने न दें। यह इस प्रकार होगा कि एक बच्चे को स्नानागार के साफ जल से निकालकर गन्दे पानी में डाल देना।
भारत का प्रथम दायित्त्व अपने प्रति होना चाहिए। कम्युनिस्ट चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थायी सदस्य बनाने के लिए संघर्ष करने के बजाय भारत को स्वयं संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थायी सदस्य के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। ऐसा करने के बजाय भारत चिनगाई शेख के विरुद्ध माओं का युद्ध करने में लगा हुआ है। विश्व को बचाने की अव्यावहारिक नीति भारत को विनाश की ओर अग्रसर कर रही है और जितनी जल्दी इस आत्मघाती विदेश नीति में बदलाव किया जाता है भारत के लिए उतना अच्छा होगा। एशियाई देशों के लिए संघर्ष करने से पूर्व भारत को हर संभव प्रयास कर हर प्रकार की सहायता प्राप्त कर अपने आपको मज़बूत बनाना होगा तभी उसकी मत प्रभावशाली होगा। अनुसूचित जाति संघ इसी प्रकार की विदेश नीति का अनुसरण करेगा।
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- संसाधनों का प्रश्न
कार्यक्रम, केवल शब्दों या विचारों का मामला नहीं है। यदि इसे कार्यान्वित किया जाना है तो इसके लिए आवश्यक है कि अपेक्षित वित्त पोषण प्राप्त किया जाए। कोई भी तब तक पार्टी के कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं लेगा जब तक पार्टी यह स्पष्ट करने में समर्थ नहीं होती कि वह अपना खर्च कैसे वहन करेगी।
यद्यपि संघ द्वारा निर्धारित किये गये कार्यक्रम के लिए अपेक्षित राशि किसी भी रूप में कम नहीं है फिर भी वित्तीय समस्या असाध्य नहीं है। अनुसूचित जाति संघ ने देश के विकास के लिए वित्त की बढ़ोतरी हेतु निम्नलिखित सुझाव दिये हैं ः