394 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के। जो भी हो, शराबबन्दी की नीति को बदला जाना चाहिए और लोगों के धन के वृहत् रूप से अपव्यय को रोका जाए और संसाधनों का उपयोग सामान्य कल्याण को बढ़ाने के लिए किया जाये।
- जहाँ तक बीमा के राष्ट्रीयकरण का संबंध है यह धन का अत्यधिक लाभकारी स्रोत है, जैसा कि निम्न आंकड़े दर्शाते हैं :
बीमा अधिनियम के अधीन 1950 में कुल कितने
339
बीमाकर्त्ता पंजीकृत हुए
वर्ष 1949 में कुल कितनी जीवन बीमा पॉलिसियॉं की गई 33,03,000 बीमाकृत राशि
7,39,49,00,000
बीमा किश्त द्वारा वार्षिक आय 37,18,00,000
अपेक्षानुसार सरकारी प्रतिभूतियों में कुल निवेश
8,64,16,000
प्रबन्धन पर व्यय प्रीमियम आय का 29.2 प्रतिशत
- इन आंकड़ों से यह देखा जा सकता है कि जीवन बीमा कम्पनियों में प्रतिवर्ष 37 करोड़ रुपये जमा होते हैं। बैंक जमा की तरह यह डिमांड जमा नहीं है। डिमांड जमा न होने के कारण इन्हें लम्बी अवधि की विकास परियोजनाओं में आसानी से विनियोजित किया जा सकता है। यह सत्य है कि बीमा कम्पनियाँ अपने धन का निवेश सरकारी प्रतिभूतियों में करती है ताकि अंततः यह कहा जा सके कि सरकार ही है जिसे बीमा धन प्राप्त होता है। परन्तु यह बीमा के राष्ट्रीयकरण का उत्तर नहीं है। सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश की जाने वाली राशि 37 करोड़ रुपए में से केवल 9 करोड़ रुपये हैं जो बहुत थोड़ी है। दूसरी सरकार को इन प्रतिभूतियों पर ब्याज देना पड़ता है जो कि करदाताओं पर व्यर्थ का बोझ है। तीसरा, बीमा कम्पनियाँ प्रीमियम से आय का 29 प्रतिशत वार्षिक स्वयं अपने आप पर व्यय करती है जो कि वर्ष 1949 के लिए 37 करोड़ रुपये में से 11 करोड़ रुपये बनता है। धन का यह अपव्यय असहनीय है। इस सबको राष्ट्रीयकरण द्वारा रोका जा सकता है।