खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 43

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक अन्य संकल्प में आग्रह किया गया कि हिन्दू पुरोहिताई के लिए व्यक्तियों के प्रवेश हेतु एक प्रतियोगी परीक्षा ली जाए और लाइसेंस केवल सफल उम्मीदवारों को ही दिए जाएं।

भाषणों में मुख्यतः ब्राह्मणों और ब्राह्मणत्व की निंदा की गई थी। श्री मंडलिक ने बैठक को संबोधित करने की अनुमति मांगी परंतु अध्यक्ष ने अनुमति नहीं दी।

एक स्पृश्य, श्री डी.वी. प्रधान ने भी ‘स्मृति’ जलाए जाने का समर्थन किया।

तत्पश्चात्,’ ‘स्मृति’ जलाए जाने का समारोह हुआ और सम्मेलन दिन भर के लिए समाप्त हुआ।’’ ख्1,

‘‘डॉ. अम्बेडकर और उनके अनुयायियों द्वारा 25 दिसम्बर, 1927 को मनुस्मृति की होली जलाया जाना इस युग का पूर्वानुमान करना था। मनुस्मृति की होली जलाने के बारे में बोलते हुए, डॉ. अम्बेडकर ने 1938 में टी.वी. परवते के साथ एक साक्षात्कार में कहा था ‘‘मनुस्मृति की होली जलाना नितांत साभिप्राय था। हमने इसकी होली इसलिए जलाई कि हम इसे उस अन्याय का प्रतीक समझते हैं जिसके नीचे हम सदियों से पिसते आए हैं। इसके उपदेशों के कारण हम घृणित निर्धनता के नीचे पिसते आये हैं और इसलिए हमने विरोध किया, सब कुछ दांव पर लगा दिया। हथेली पर जान रख दी और कार्य को पूरा किया।’’ ख्2,

‘‘कलक्टर, पुलिस अधीक्षक और 100 सशस्त्र पुलिस वाले उपस्थित थे। रात में, एक ‘‘अछूत’’ द्वारा लिखा गया और ब्राह्मणों पर आघात करने वाला हरिकीर्तन उत्साहपूर्वक गाया गया।

कलक्टर का पत्र
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सम्मेलन के दूसरे दिन की कार्यवाही तारीख 26 की सुबह आरंभ हुई। डॉ. अम्बेडकर ने कलक्टर से प्राप्त एक पत्र पढ़ा जिसमें कहा गया था कि सरकार चाहती है कि ‘‘अछूतों’’ को सिविल न्यायालय के व्यादेश का पालन करना चाहिए। सरकार अछूतों के आंदोलन के प्रति हमेशा सहानुभूतिपूर्ण है और उनके आंदोलन को हर कानूनी तरीके से बढ़ावा देना चाहती है तथा जनोपयोगी स्थानों में उनके प्रवेश

* 1.2. मनुस्मृति।द इंडियन नेश्नल हेराल्ड, दिनांक 31 दिसम्बर, 1927।परवते, पृष्ठ 58-59।