50. चुनाव याचिका। - Page 437

420 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

25(1) के अनुसार गैर-कानूनी है और अधिनियम का उल्लंघन है।

उन्होंने कहा कि धारा 100 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘‘चुनाव को व्यापक रूप से व्याप्त भ्रष्टाचार के आचरण के आधार पर खारिज कर दिया जाए’’ और पूछा कि क्या ट्रिब्यूनल गलत ढंग से किये गये प्रचार के परिणामस्वरूप बेकार हुए 74333 मतों को बड़ी संख्या नहीं मानता है। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अपनी सीट 13000 मतों से हारी है। मैं धृष्टता नहीं कर रहा हूँ, परंतु श्री डांगे द्वारा बेकार किये गये 39000 मतों में से मुझे निश्चित रूप से बहुत अधिक संख्या में वोट मिले होते यदि उनके एवं डॉ. देशमुख द्वारा दुष्प्रभावी प्रचार न किया गया होता’’।

‘‘बेमेल मैत्री का अध्याय’’
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श्री डांगे के वकील, श्री ए.एस.आर.चारी, ने डॉ. अम्बेडकर एवं समाजवादी नेता श्री अशोक मेहता की याचिकाओं को सोशलिस्ट एवं अनुसूचित जाति संघ के बीच बेमेल मैत्री का अंतिम अध्याय बताया है। उसने कहा कि याचिकादाताओं के अपने गवाह श्री बापूराव जगतप ने न्यायधिकरण को बताया है कि वामपंथियों ने याचिकादाताओं से ‘हाथ जोड़कर’ प्रार्थना की थी कि वामपंथ में शामिल हो जाएं, उन्होंने इस प्रार्थना को ठुकरा दिया क्योंकि उनको अपनी ताकत पर जरूरत से ज्यादा भरोसा था।

श्री चारी ने कहा कि अधिनियम की धारा 63 की शर्त के अनुसार मतदाता को अपने दोनों मतों का प्रयोग करने की कोई बाध्यता नहीं है क्योंकि वह एक प्रत्याशी को मतदान दे सकता है या मतदान करने से पीछे हट सकता है। उनका तर्क था कि केवल एक प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करना या किसी एक प्रत्याशी के लिए मतदान न करना ‘‘अनुचित प्रभाव’’ की परिभाषा के अनुसार मतदाताओं द्वारा अपनी इच्छानुसार स्वतंत्र रूप से मतदान करने में हस्तक्षेप नहीं माना जाता है। और यह कि श्री डांगे या अन्य किसी प्रत्याशी का कोई भी कृत्य जन-प्रतिनिधि अधिनियम में उल्लिखित ‘भ्रष्ट आचरण’ की परिभाषा में नहीं आता है। और यह कि श्री डांगे ने जो कुछ किया है वह मतदाता को प्रेरित करने के लिए किया है जिसका उनको अधिकार था। याचिकादाताओं ने अपनी याचिका इसलिए डाली कि वे अपने समर्थकों के समक्ष अपनी हार के लिए न्यायसंगत कारण रख सकें; पिछले चुनाव में याचिकादाताओं की हार का कारण उनका वामपंथी मोर्चे, जो कांग्रेस और साम्प्रदायिक तत्वों से संघर्ष करना चाहता था, के साथ समझौता करने से अहंकारवश मना करना था।