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जन-साधारण के ढुलमुल रवैये के कारण बौद्ध धर्म भारत से लुप्त हो
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डॉ. अम्बेडकर ने डी.वाली. सिन्हा, महासचिव, महाबोधि सोसाइटी, कलकत्ता को दिनांक 16 फरवरी, 1955 को लिखे अपने पत्र में धम्म दीक्षा के संबंध में अपने विचार व्यक्त किये।
पत्र निम्न प्रकार से है :- सम्पादक
‘‘मेरी राय है कि जन-साधारण का धर्म-परिवर्तन किसी प्रकार से धर्मान्तरण नहीं है। यह दिखावा मात्र है। कथित बौद्ध जन बुद्ध की पूजा करने के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं जिनका ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को समाप्त करने के लिए प्रतिष्ठापन किया है, कि पूजा करना जारी रखा। भारत से बौद्ध धर्म के लुप्त होने का मुख्य कारण जनसाधारण का ढुलमुल रवैया है। यदि भविष्य में बौद्ध धर्म को भारत में स्थायी रूप से प्रतिस्थापित करना है तो जन-साधारण को इसके साथ अन्य रूप से जोड़ना होगा। ऐसा पूर्व में नहीं हुआ क्योंकि बौद्ध धर्म में संघ में दीक्षा के लिए अनुष्ठान होता था परन्तु धम्म में दीक्षा के लिए ऐसा कोई अनुष्ठान नहीं है। ईसाई मत में दो अनुष्ठान होते हैं : (1) वपतिस्मा, जो कि इसाई धर्म को स्वीकार करने की दीक्षा है; (2) पादरी की नियुक्ति। भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए नया आन्दोलन चलाने के लिए ईसाई मत का अनुकरण करना होगा। बौद्ध धर्म में इस भयंकर बुराई को हटाने के लिए मैंने एक सूत्र तैयार किया है जिसे मैं धम्म दीक्षा कहता हूँ। हर कोई जो बौद्ध धर्म में अपना धर्मान्तरण करना चाहता है तो उसे इस अनुष्ठान से गुजरना होगा अन्यथा उसे बौद्ध नहीं माना जाएगा।’’ ख्1,
- खैरमोरे, खण्ड 12, प्रथम संस्करण, जुलाई, 1992, पृष्ठ 24-25।