430 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वेरियर एलविन कुछ माह पूर्व भारत में लगभग मामले के प्रारम्भ होने के समय तक उनके साथ थे।
वेरियर एलविनः हाँ, यह वर्ष 1931 की बात है जब मैं उसके साथ अहमदाबाद में एक मन्दिर में गया, जो कि एक प्रतिष्ठित मिल-मालिक का था, और गाँधी अस्पृश्य बच्चों के एक दल को मन्दिर में ले गये। मुझे अभी भी उन कट्टरवादी पुजारियों के चेहरे याद हैं जब बच्चे मन्दिर में गये तो पुजारियों को यह अच्छा नहीं लगा परन्तु बाद में गाँधी ने एक बैठक बुलाई और इस बैठक में उसने कहा कि भविष्य में अस्पृश्यों को ईश्वर के बच्चे हरिजन, जिस नाम से वे आज तक जाने जाते हैं, बुलाया जाने चाहिएं।
वाचकः परन्तु गोल मेज़ सम्मेलन पर एक नया एवं मजबूत चेहरा देखने को मिला। अस्पृश्नीय के रूप में जन्म लेकर डॉ. अम्बेडकर ने अपनी प्रतिभा एवं चरित्र के बल पर अपने आपको विशिष्ट व्यक्ति बनाया और वे नहीं चाहते कि कोई हिन्दू जाति उनकी ओर से यह संघर्ष करे।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हमें एक अलग निर्वाचन-क्षेत्र दिया जाए।
वाचकः डॉ. अम्बेडकर स्पष्ट एवं अडिग थे। बाद में भी गांधी की ओर उनका नजरिया कभी नहीं बदला।
बी.आर. अम्बेडकरः अस्पृश्नीयता के बारे में इन सब बातों का उद्देश्य अस्पृश्यों को कांग्रेस में लाना था, यह एक बात है भी और दूसरा आप जानते हैं कि वे चाहते थे कि अस्पृश्नीय उनके स्वराज्य के आन्दोलन का विरोध न करें। मैं नहीं समझता कि इसके अतिरिक्त उत्थान करने का उनका कोई वास्तविक उद्देश्य था।
वाचकः परन्तु भारत वापिस जाने के पश्चात् गाँधी द्वारा पूना में किए गए अनशन से साबित होता है कि उनके उद्देश्य काफी दृढ़ थे। प्यारे लाल को याद है कि वे लंदन सम्मेलन के अन्तर्द्वन्द्व के समय से इस के लिए तैयार थे।
प्यारे लाल नायरः उन्होंने कहा था कि वे भारत की स्वतन्त्रता के लिए भी अस्पृश्यों के महत्वपूर्ण हितों का सौदा नहीं करेंगे। परन्तु वे जानते थे कि अस्पृश्यों की भारी संख्या के लिए अलग निर्वाचन-क्षेत्र बनाना ठीक नहीं होगा। अतः उन्होंने कहा था कि यदि वे अकेले भी हैं तो जी जान से भी इसका विरोध करेंगे। उस समय भी किसी ने नहीं सोचा था कि अन्ततः इसका क्या परिणाम होगा।’’ ख्1,
- बीबीसी - गांधी जी, ओरियेन्ट लांगमैन्स की बम्बई, कलकत्ता तथा मद्रास में बातचीत। आलेख
एवं वाचन, फ्रांसिस वॉटसन द्वारा प्रोडेक्शन मॉरिस ब्राउन द्वारा, पृष्ठ 9, 10, 16, 78 तथा 79
पुनर्मुद्रित : शत्रु, रेमिनिसेन्सेज एंड रेमेम्ब्रेन्स ऑफ डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, पृष्ठ 159-162।