442 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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भिक्खू बुद्ध की सेवा उसके धम्म के उपदेशक बनकर करें।
‘‘डॉ. बी.आर. अम्बेडकर
एम.ए., पी.एच.डी., डी.एस.सी., एलएल.डी., डी. लिट्, बैरिस्टर-एट-लॉ
सदस्य, राज्य परिषद्
26, अलीपुर रोड, सिविल लाईंस, दिल्ली
दिनांक 30 अक्टूबर, 1956
प्रिय वलीसिन्हा,
आपके दिनांक 25 अक्तूबर, 1956 के पत्र के लिए धन्यवाद। निश्चय ही यह बहुत बड़ा कार्यक्रम था और धर्म परिवर्तन के लिए उमड़ा जनसमुदाय मेरी उम्मीद से अधिक था। शुक्र है बुद्ध का कि सभी कुछ अच्छा हुआ।
मुझे खुशी है कि आप यह समझते हैं कि कार्य बेहतर ढंग से प्रारम्भ हो जाने के कारण हमें भविष्य में इसकी निरंतर प्रगति देखने को मिलेगी। हमें उस जनसमुदाय, जिन्होंने उनके धम्म को स्वीकार किया है और मेरे कहने पर इसे स्वीकार करेंगे, को बौद्ध धर्म की जानकारी देने के तरीकों एवं साधनों पर विचार करना होगा। निस् संदेह हमें काफी संख्या में लोगों को धम्म की शिक्षा देने के लिए कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना होगा परन्तु इस कार्य को बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम कार्यकर्ता भिक्खू हैं। वे इस कार्य को अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप करेंगे जिसे सामान्य-जन द्वारा नहीं किया जा सकता।
मेरे मतानुसार भिक्खुओं को यह जानकर अत्यंत प्रसन्न होना चाहिए कि काफी कार्य जो उनके द्वारा किया जाना था पूर्ण हो चुका है। भिक्खुओं के साथ केवल एक समस्या है कि वे जन-समुदाय की भाषा सीखने पर ध्यान नहीं देते हैं। मेरा विचार है कि संघ को अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा और विरागी बनने की बजाए उन्हें ईसाई धर्म प्रचारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक प्रचारकों की भांति बनना होगा। जैसाकि मैंने आज कहा कि वे न तो आर्य हैं और न ही समाज के उपयोगी सदस्य हैं। यह वास्तविकता उनके मस्तिष्क में डालनी होगी और उनको यह एहसास कराना होगा कि वे बुद्ध की सेवा भली-भांति उसके धम्म के प्रचारक बनकर कर सकते हैं।