खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 46

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27 दिसम्बर की सुबह, डॉ. अम्बेडकर संघर्ष के संबंध में पहले संकल्प को वापस लेने और स्तब्ध खामोशी के बीच सम्मेलन का संघर्ष स्थगित करने के लिए निवेदन करने वाले दूसरे संकल्प को प्रस्तुत करने के लिए खड़े हुए। वे दुविधा में थे। यह अब प्रतिनिधियों के उत्साह को नियंत्रित करने तथा उसे नीचे पकड़ रखने का मनोवैज्ञानिक क्षण था। उन्होंने इस संकटपूर्ण स्थिति से व्यवहारकुशल ढंग से निपटना आरंभ किया। उन्होंने प्रतिनिधियों से, जो अब तक बेचैन और उत्तेजित हो गए थे, आकर्षक आवाज में कहा : ‘‘आप एक बहादुर जनसमूह हो, जो लोग अपने उचित अधिकारों की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित करने हेतु तैयार हैं, वे निश्चित रूप से उन्नति करेंगे। परंतु अब वह समय आ गया है जब प्रहार करने से पहले आपको दो बार सोचना चाहिए। आप अच्छी तरह जानते हैं कि गांधी द्वारा आरंभ किया सत्याग्रह आन्दोलन’’, ‘‘जनता द्वारा समर्थित था क्योंकि यह विदेशी शासन के विरुद्ध था। हमारा संघर्ष सवर्ण हिन्दुओं के जनसमूह के विरुद्ध है और स्वाभाविक रूप से, हमको बाहर से थोड़ा समर्थन प्राप्त है। इन तथ्यों पर विचार करते हुए, मैं महसूस करता हूं कि हमें सरकार को विरोधी नहीं बनाना चाहिए तथा उसको अपने विरोधी पक्ष की तरफ नहीं रखना चाहिए। यह भी लाभदायक नहीं है।’’

यह मत मानिये ’’नेता ने बलपूर्वक कहा, ‘‘कि यदि आप इस मामले को स्थगित कर देते हैं तो आप अपमानित होंगे। जहां तक मेरी स्थिति का संबंध है, मैं आपको आश्वासन देता हूं कि मैं तिगुने खतरे, आदेश का पालन न करने, एक अधिवक्ता के व्यवहार को शासित करने वाले नियमों के भंग का दोषारोपण किये जाने और कारावास की संभावना का सामना करने के लिए तैयार हूं। मेरे भाइयो,’’ उन्होंने धीमी आवाज में समाप्त किया, ‘‘आप आश्वस्त रहिए, इस संघर्ष के स्थगित किए जाने का यह अर्थ नहीं होगा कि हमने संघर्ष छोड़ दिया है। यह लड़ाई हमारे द्वारा इस तालाब पर अपना दावा स्थापित किए जाने तक चलती रहेगी।’’ ख्1,

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विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप निम्नलिखित संकल्प अंगीकृत किया गया :

‘‘इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि महाद के स्पृश्य वर्गों द्वारा अंतिम समय में सिविल न्यायालय से दलित वर्गों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त किया जाना उनको, सरकार के पक्ष में होने की स्थिति में ले आता है, उन्होंने कलक्टर की बात

  1. कीर, पृष्ठ 102-102।