परिशिष्ट - II : मनुष्य की मनुष्य के प्रति अमानवीयता। - Page 468

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परिशिष्ट - 2
मानव की मानव के प्रति अमानवीयता
(एम.के. गाँधी द्वारा)

‘‘एक अन्य कॉलम में काठियावाड गाँव में दलित वर्ग के सदस्य की मरणासन्न पत्नी के प्रति चिकित्सक की जानबूझकर की गई अमानवीयता के अत्यन्त अपमानजनक मामले का नवजीवन से लिया गया उद्धरण देखा जा सकेगा। सार्जेंट अमृत ठक्कर, जिन्हांने मामले का विवरण दिया है, ने इस डर से स्थान और पार्टियों के नाम नहीं दिए हैं ताकि दलित वर्ग का बेचारा स्कूल मास्टर, चिकित्सक द्वारा और अधिक प्रताडि़त नहीं किया जा सके। लेकिन मैं चाहता हूँ कि नाम सूचित किये जाएँ। समय अवश्य आयेगा जब दलित वर्ग के लोग हमारे द्वारा प्रोत्साहित होंगे तथा और अधिक मुश्किलों और क्रूरताओं को सहन न करने का साहस दिखायेंगे। उनकी मुसीबतें पहले ही बहुत अधिक हैं कि उनको और अधिक मुसीबतें न झेलनी पडं़े। लोक मत को ऐसी शिकायतों, जिनको साबित न किया जा सके उनके मूल कारण को खोजा न जा सके, के आधार पर उकसाया नहीं जा सकता। मुझे बम्बई में चिकित्सा परिषद् के नियमों की जानकारी नहीं है। मैं जानता हूँ कि अन्य स्थानों पर चिकित्सक, जो अपनी फीस के भुगतान से पूर्व इलाज करने से मना करता है तो वह परिषद् के प्रति जवाबदेह होता है और उसका नाम परिषद् की सूची से हटाया भी जा सकता है तथा उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। निस्संदेह फीस वसूलनीय है परन्तु रोगियों का उचित उपचार चिकित्सक का प्रथम कर्त्तव्य है। यदि वर्णित तथ्य सत्य है तो वास्तविक अमानवीयता यह है कि चित्सिक अस्पृश्य के क्वार्टर में प्रवेश करने से मना किया, रोगी को देखने से मना किया और स्वयं थर्मामीटर लगाने से मना किया यदि किन्हीं परिस्थितियों में कभी अस्पृश्यता का सिद्धांत लागू करना पड़ सकता है तो निश्चित रूप से चिकित्सीय व्यवसाय, जिसे इसने अपमानित किया है, के इस सदस्य पर लागू होगा। परन्तु मैं विश्वास करता हूँ कि सार्जेंट ठक्कर के संवाददाता ने वक्तव्य को कुछ बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया है और यदि ऐसा नहीं है तो चिकित्सक स्वयं आगे आयेगा और समाज को जिसे उसने अपने अमानवीय आचरण से अत्याधिक क्रोधित किया है, अपना स्पष्टीकरण देगा।