परिशिष्ट - II : मनुष्य की मनुष्य के प्रति अमानवीयता। - Page 469

452 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पढ़ों, चिन्तन करो और शोक मनाओ
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काठियावाड के एक गाँव में दलित वर्गों के बच्चों के लिए एक स्कूल है। अध्यापक सभ्य, देशभक्ति से परिपूर्ण व्यक्ति है और धीध या जुलाहा (अस्पृश्य) वर्ग से सम्बन्धित है। वह अपनी शिक्षा के लिए महामहिम गायकवाड़ की अनिवार्य शिक्षा नीति का ऋणी है और अपने समुदाय की समुन्नति के लिए अपनी ओर से योगदान दे रहा है। वह अच्छी आदतों और परिशुद्ध शिष्टाचार वाला व्यक्ति है और कोई भी उसे अस्पृश्नीय वर्ग से सम्बंधित नहीं मान सकता। परन्तु वह अपने भाग्य या दुर्भाग्य के कारण कठियावाड के रूढि़वादी गाँव में अपने स्वयं के समुदाय के बच्चों को पढ़ा रहा है जहाँ हर कोई उसे अस्पृश्य मानता है। परन्तु वह इसकी परवाह किये बिना चुपचाप काम कर रहा है। लेकिन कुछ ऐसे भी क्षण होते हैं जब असहनीय स्थिति में रहने वाला अत्यन्त संयमी व्यक्ति मानसिक पीड़ा और रोष का शिकार हो जाता है, जैसे कि स्कूल मास्टर के निम्नलिखित पत्र से स्पष्ट है। इसका प्रत्येक छोटा वाक्य करणता से भरा हुआ है। मैंने जानबूझकर पत्र में उल्लिखित गाँव एवं सभी लोगों के नामों को हटा दिया है ताकि स्कूल मास्टर और अधिक मुसीबत में न फँस जाए।

नमस्कार! मेरी पत्नी ने इस मास की 5 तारीख को एक बच्चे को जन्म दिया। वह 7 तारीख को बीमार हो गई, उसको पेचिश होने लगी, उसकी आवाज़ बन्द हो गई श्वॉस लेने में कठिनाई होने लगी और छाती पर सूजन आ गई और उसकी पसलियों में असहनीय दर्द हो रहा था। मैं डाक्टर को बुलाने गया परन्तु उन्होंने कहा, मैं अस्पृश्य के क्वार्टस में नहीं आऊँगा। मैं उसकी चिकित्सा जाँच भी नहीं करूँगा। तब मैंने नगरसेठ और गारसिया दरबार को सम्पर्क किया और उनसे अनुरोध किया कि वे अपने पदों का प्रयोग मेरे लिये करें। वे आये और डाक्टर की फीस के रूप में 2/- रुपये का भुगतान करने के लिए नगर सेठ मेरे लिए जमानती बने और इस शर्त पर कि रोगी को अस्पृश्यों के क्वार्टरों के बाहर लाया जाएगा चिकित्सक ने आने की सहमति दी। वे आए और उस महिला, जिसका बच्चा केवल दो दिन का था, को बाहर लाये। तब डॉक्टर ने थर्मामीटर एक मुसलमान को दिया जिसने इसे मुझे दिया। मैंने थर्मामीटर लगाया और तब मुसलमान को वापिस कर दिया जिसने इसे डॉक्टर को दे दिया। लगभग 8 बजे थे और लैम्प की रोशनी में थर्मामीटर देखकर उसने कहा, उसको निमोनिया और श्वॉस का रोग है। इसके पश्चात् डाक्टर चला गया और दवाइयाँ भेज दीं। मैंने मार्किट से अलसी क्रय की और हम अलसी की पुलटिस लगाने लगे और उसको दवाई देते रहे। डॉक्टर ने उसकी जाँच करने की दया नहीं दिखाई और उसे केवल दूर से ही देखा। अन्ततः मैंने उसकी फीस 2/- रुपये दिये। यह एक गंभीर बीमारी है। सब कुछ ईश्वर के हाथों में है।