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‘‘वह (डॉ. वी.आर. अम्बेडकर)’’ अब साहसी बन गए हैं और उन्होंने स्पेन्सर की उक्ति को शब्दशः अपनाया है, साहसी बनो! साहसी बनो और निरन्तर अधिक साहसी बनो उन्होंने सीखा कि निर्भीकता एवं साहस द्वारा बड़े से बड़े भय एवं कमजोरियों से मुक्त हुआ जा सकता है। वे अत्यधिक सशक्त स्वभाव के थे और लोग उनका आवश्यकता से अधिक आदर सम्मान करते थे। वह अनुचित नम्रता के साथ बलपूर्वक प्रेरित महात्मा गाँधी का भी दलित वर्गों की ओर, जिनके लिए उन्होंने सम्मानजनक सम्बोधन ‘हरिजन’ चुना, सेवा का अद्वितीय रिकॉर्ड रहा है परन्तु डाक्टर कोई प्रतिद्वंद्वी सहन नहीं कर सकते थे। किसी अन्य को उस स्थान पर आसीन किया जाना उन्हें गवारा नहीं था। असामान्य सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के कारण भारतीय समाज ने अपने आपको जिस रसातल की ओर धकेला था। उसकी असामान्य संतति होकर डॉ. अम्बेडकर ने जानबूझकर स्वयं को एक असामान्य व्यक्तित्व के रूप में विकसित किया था। (मेन एक सुपरमेन ऑफ हिन्दुस्तान, पृष्ठ-20)
डॉ. अम्बेडकर के रामसे मेकडोनाल्ड को किए गए इस अनुरोध से कि विधानसभा में जातीय अनुपात का निर्णय किया जाये, ने उग्र राजनीतिज्ञ के जीवन को संभ्रमित कर दिया था। डाक्टर ने यरवदा जेल के गेट पर यह घोषणा की-
मुझे विश्वास है कि मुझे गाँधी के जीवन और मेरे लोगों के अधिकारों के मध्य चुनाव करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। मैं कभी सहमति नहीं दूंगा कि मेरे लोग हाथ-पैर बांधे हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी हिन्दुओं के अधीनस्थ बने रहें। यदि सैंकड़ों महात्मा बलि चढ़ जाते हैं तो भी मुझे इसकी परवाह नहीं है। महात्मा जन कोई शाश्वत प्राणी नहीं है। आप सभी मुझे किसी भी नज़दीकी बिजली के खम्बे से फाँसी पर लटकाने के लिए स्वतन्त्र हैं। महात्मा ने डॉ. को कहा, ‘मुझे तुम पर गर्व है। मैं तुम्हारे भाषण हमेशा ध्यानपूर्वक सुनता हूँ। (मेन एक सुपरमेन ऑफ हिन्दुस्तान, पृष्ठ-22) ख्1,
- पुनर्मुद्रित, खैरमोरे, खण्ड 4, पृष्ठ 168-169।