परिशिष्ट - V : गोल मेज सम्मेलन और पूना संधि पर टिप्पणी। - Page 479

462 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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उपनाम से लिखने वाला लेखक

सार्वजनिक मामलों के एक विद्यार्थी ने अपनी पुस्तक ‘‘क्या कांग्रेस असपफल हो चुकी है?’’ में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त कियेः उसके अत्यधिक उत्साही समर्थक भी दावा नहीं करेंगे कि श्री गाँधी की उस सम्मेलन में सहभागिता सफल रही थी। साम्प्रदायिक भेदभाव ने सभी क्षेत्रों में प्रगति को रोका हुआ था और अल्पसंख्यक उपसमिति अन्ततः किसी फैसले पर पहुँचने में असफल रहने की रिपोर्ट देने के लिए बाध्य थी। किसी जाति, सिवाय गाँधी मुसलमान, सिख और यूरोपियन समुदायों के अतिरिक्त किसी अन्य समुदाय के लिए अलग मतदाता सूची के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए हमेशा दृढ़तापूर्वक मना करते थे और दलित वर्गों के संबंध में वह जोर देकर कहते थे कि वे हिन्दू थे और उन्हें हिन्दू संगठन में ही रखा जाना चाहिए। डॉ. अम्बेडकर को गांधी के इस हठी रवैये के परिणामस्वरूप दलित वर्गों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र बनाने की एक निश्चित माँग प्रवेश करने के लिए मजबूर होना पड़ा-(पृष्ठ-55) ख्1,

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डॉ. एम.आर. जयकर ने अपनी आत्मकथा में कहा था किः

‘‘ इंग्लैंड में भारतीय गोल मेज सम्मेलन में उनके (महात्मा) रवैये ने अल्पसंख्यकों को विख्यात अल्पसंख्यक समझौता स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। उसने दलित वर्गों के लिए कांग्रेस के माध्यम के सिवाय आरक्षण द्वारा एक भी सीट देने के लिए मना कर दिया। बाद में उन्होंने प्रधान मंत्री मेक डोनाल्ड के पूना समझौते की अपेक्षाकृत अधिक संतुलित व्यवस्था के निर्णय के विरुद्ध अनशन किया जिसे बाद में माना बंदूक की नोक पर लागू करना पड़ेगा। इस समझौते की प्रतिक्रिया पर बंगाल के नेताओं, ने जो पहले गाँधी जी के विश्वासी अनुयायी रहे थे, गंभीर शोक जताया। (द स्टोरी ऑफ माई लाइफ, खंड एक, पृ. 361-62)’’ ख्2,

  1. रवैरमोरे, खण्ड 4, पृष्ठ 173।

  2. तत्रैव, पृष्ठ 173।