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पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिन के अवसर पर, ‘‘ए बंच ऑफ ओल्ड
लेटर्स’’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की गई थी। पुस्तक में श्री एडवर्ड थामसन का
पत्र, जिसे उन्होंने 6 दिसम्बर 1936 को लिखा था, सम्मिलित है, जिसमें उन्होंने
कहा है कि,
‘‘मैंने गाँधी के बारे में गोल मेज़ सम्मेलन तक, जब वह अंहकारी एवं असंगत थे,
कभी गलत नहीं सोचा था। संभवतः उन्हें आना ही नहीं चाहिए था। परंतु सम्मेलन
में आकर बहुत से भारतीयों के विचारों को अस्वीकार करना सर्वथा अनूचित था।
इसमें ऐसे कई व्यक्ति थे, जिन्हें अपने विचार व्यक्त करने की कीमत चुकानी पड़ी
थी, ये ऐसे व्यक्ति थे जो गांधी द्वारा परामर्श लिए जाने के और एक साझा कार्य
और संकल्पनाओं का साकार करने के कार्य में लगे मित्र समझ जाने के योग्य थे।
(पृष्ठ- 208)’’ ख्1,
6
श्री ग्लोरनी बोल्टन ने अपनी पुस्तक ‘द ट्रेजडी ऑफ गाँधी’ में कहा
हैः
‘‘सच्चाई है कि श्री गाँधी लंदन में आधारहीन हो गए थे और पुराना आश्वासन
और भरोसा उनका साथ छोड़ रहा था। सम्मेलन में जिससे वे तंग आ चुके थे
दिन-प्रतिदिन उन्हें मुसलमान शिष्टमंडल का सामना करना होता था क्योंकि उन्होंने
उनकी कोई भी माँग नहीं मानी थी। दिन प्रतिदिन डॉ. अम्बेडकर की प्रतिष्ठा में वृद्धि
हो रही थी। वे अस्पृश्नियों के लिए बोलते थे और भारत के कल्याण के संबंध में कोई
भी भाषण चाहे वह रूढि़वादी अथवा समाजवादी की ओर से होता - परंतु उनका
भाषण रूढि़वादी या समाजवादी पर था परन्तु उसमें अस्पृश्यों की त्रासद दशा का
उल्लेख अवश्य होता था। यह व्यावहारिक प्रसंग की अपेक्षा संवेदनशील अधिक था।
श्री गाँधी ने अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए इंग्लैंड में लगभग सभी वर्गों से प्रशंसा
- खेरमोरे पृष्ठ 173-174।