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टिप्पणियां
‘‘इस घटना पर संपादकीय टिप्पणी देते हुए ‘‘कोलाबा समाचार’’ ने दिनांक 7 जनवरी के अपने अंक के कॉलम में दिए गए सुझाव को इंगित करते हुए डॉ. अम्बेडकर द्वारा अपनाई गई पद्धतियों का हवाला दिया कि सरकार को डॉ. अम्बेडकर और उनके अनुयायियों पर मुकदमा चलाने का मार्ग अपनाना चाहिए। समाचारपत्र सुझावों के विरुद्ध अपना पक्ष इस आधार पर रखता है कि भारतीयों को स्वयं अपने झगड़े निपटाने का यथा संभव प्रयास करना चाहिए और स्वयं अपनी ओर से सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए कभी आमंत्रित नहीं करना चाहिए।’’ ख्1,
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पिछले कुछ सप्ताहों से महाड में डॉ. अम्बेडकर और अछूतों का सत्याग्रह सम्मेलन न केवल रूढि़वादी हिन्दु प्रेस में, बल्कि उन पत्र-पत्रिकाओं में भी, जो निश्चित रूप से अस्पृश्यता को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, बहुत प्रतिकूल टिप्पणियों का विषय रहा है। अधिकांश मराठी पत्रिकाएं दूसरे किस्म के अन्तर्गत हैं और इन्हें साधारणतया तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है यथा, एनसीओ, प्रत्युत्तरवादी और गैर-ब्राह्मण। इन पत्रिकाओं ने डॉ. अम्बेडकर और उनके मित्रों के विरुद्ध अपने लेखों में जो आक्रमण किया है उनके प्रमुख बिंदू (1) मनुस्मृति जलाने की उनकी कथित ज्यादती और (2) सत्याग्रह रोकने के लिए कोलाबा के जिलाधीश के आदेश में उनकी कथित मौन सम्मति। इस पूर्ण विवाद में दोनों पक्षों के विरुद्ध कई अन्य आरोप और प्रत्यारोप हैं, परंतु वे बहुत वास्तविक नहीं हैं। डॉ. अम्बेडकर ने अब ‘‘बहिष्कृत भारत’’ में सम्मेलन का बहुत विस्तारपूर्वक लेखा-जोखा प्रकाशित किया और अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का उत्तर दिया है। उन्होंने अपने विरुद्ध पहले आरोप का विरोध करने में शर्म महसूस नहीं की और उसका यह कहते हुए प्रतिरोध किया कि जहां तक ‘‘मनुस्मृति’’ अछूत हिन्दुओं की कथित उच्च वर्ग के हिन्दुओं द्वारा दीर्घकाल से किए जा रहे उत्पीड़न और शोषण का आदेश देती है और उसे उचित ठहराती है, वर्तमान हिंदू कानून का यह मुख्य स्रोत जलाए जाने योग्य है। दूसरे आरोप का उत्तर देते हुए डॉ. अम्बेडकर अपने विरोधियों के तर्कों को गलत सिद्ध करते हैं जब वह यह कहते हैं कि इसके विरुद्ध कोई प्रतिबंधकरण आदेश कभी भी पारित नहीं किया गया है
- कोलाबा समाचार, दिनांक 7 जनवरी, 1928।