464 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बटोरी थी परन्तु अब डॉ. अम्बेडकर ने इस मंच को नष्ट कर दिया था। उन्होंने महात्मा का इस प्रकार से विरोध किया कि नागरिक यह विश्वास करने लग गये थे कि दो व्यक्तित्व श्री गाँधी एवं डॉ. अम्बेडकर सम्मेलन का आधिपत्य कर रहे हैं। परंतु यह कतई सच नहीं था सबसे पहले तो श्री गाँधी का सम्मेलन में पर्याप्त प्रभाव नहीं था। वे सर सैक्यूल होरे के पश्चात् बोले, जिन्होंने वे अत्यधिक पसन्द करने लगे थे। सर होरे ने अप्रत्यक्ष चुनाव के पक्ष में बोला। श्री गाँधी इससे पूर्णतया सहमत थे और उन्होंने अपने पंचायती योजना की व्याख्या करना प्रारम्भ कर दिया जिसके द्वारा गाँव अपने प्रतिनिधि चुनते हैं, गाँव प्रतिनिधियों का एक समूह अपने जिला प्रतिनिधि को चुनता है और जिला प्रतिनिधि विधानसभा के लिए प्रतिनिधि चुनते हैं। यह एक पद्धति है जो रूढि़वादी भय को कमज़ोर बनाते हुए प्रौढ़ मताधिकार का कांग्रेस की माँग को पूरा करती है। भारतीय उदारवादी शिष्टमण्डल ने इसकी प्रति अपनी उत्साहपूर्ण संस्वीकृति दी थी। ‘‘इनमें से एक ने कहा, ‘‘एक सप्ताह के भीतर रूढि़वादी गाँधी जी के चरणों में होंगे,’’ उन्होंने इस शैली में पुनः कभी नहीं बोला इसके विपरित डॉ. अम्बेडकर के साथ उनका विवाद हुआ। प्रारम्भ में मुसलमान महात्मा की असफलता से खुश नज़र आये परन्तु कुछ समय पश्चात शिष्टमण्डल के प्रत्येक सदस्य की इच्छा थी कि डॉ. अम्बेडकर श्री गाँधी के प्रति उनका निजी प्रतिष्ठा के अनुरूप आदर जिसके वह निश्चित रूप से हकदार हैं दिखाएं। (द ट्रेजेडी ऑफ गाँधी, पृष्ठ 266-267)
‘‘इसके पश्चात् सम्मेलन के विचार-विमर्श अब बो एण्ड नाइट्स ब्रिज पर ही संकेद्रित नहीं थे। मुसलमानों, यूरोपियों, एंगलो-इंडियनों, अस्पृश्नियों के प्रतिनिधियों ने मिलकर बैठक की। अल्पावधि में ही उन्होंने अल्पसंख्यकों का समझौता तैयार किया जिस पर प्रतिष्ठित सिख नेता सरदार उज्जवल सिंह को छोड़कर अल्पसंख्यकों के सभी प्रतिनिधियों ने अपने हस्ताक्षर किये। श्री बेंथॉल ने श्री गाँधी को शिष्टाचारवश समझौते की प्रतिलिपि तथा साथ में उत्साहपूर्ण स्पष्टीकरण पत्र भेजा। सेंट जेम्स में श्री गाँधी से नज़रें मिलने पर डॉ. अम्बेडकर लगभग विद्रोही ढंग से मुस्कुराए। श्री गाँधी के लिए स्पष्ट रूप से दो रास्ते खुले थे। या तो अल्पसंख्यकों का विभाजन शालीनतापूर्वक स्वीकार करें। अन्यथा अपने पक्ष में हिन्दू बहुमत तैयार करें, जो कांग्रेस के एक मात्र प्रतिनिधि के रूप में नहीं बोले बल्कि रूढि़वादी हिदू महासभा सहित, सभी हिन्दुओं के प्रवक्ता के रूप में बोले। श्री गाँधी ने शीघ्रता से समझौते की शर्तों का अवलोकन किया। उन्होंने तुरन्त यह देख लिया कि समझौता डॉ. अम्बेडकर द्वारा अपनाये गये द्वन्द्वी रवैये को इंगित करता है इस समझौते में अस्पृश्नियों के लिए अलग निर्वाचन-क्षेत्र का उदारतापूर्वक प्रावधान किया गया है। श्री गाँधी के लिए कोई स्पष्ट मार्ग नहीं था। यदि अब तक वे लंदन में अपने उद्देश्य के प्रति अनिश्चित थे तो अब उन्हें ज्ञात हो गया था कि ऐसा करना उनका दायित्व है। उन्हें अस्पृश्नियों