परिशिष्ट - V : गोल मेज सम्मेलन और पूना संधि पर टिप्पणी। - Page 482

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को उनके नेताओं से बचाना था। वे सर सेम्यूल होरे से मिले। इसके साथ ही वह श्री राम से मेकडोनाल्ड से भी मिले जिनके उत्साहपूर्ण विचारों से वे प्रभावित थे।

श्री गाँधी ने किसी अन्य विषय पर बात नहीं की उन्होंने अपने भाषण में घोषणा की ‘‘अस्पृश्नीय के लिए अलग निर्वाचन-क्षेत्र होने से वे सदा के लिए दासता में जकड़े रहेंगे। अलग निर्वाचन-क्षेत्र होने पर भी मुसलमान मुसलमान ही रहेगा। क्या आप चाहते हैं कि अस्पृश्य हमेशा अस्पृश्य ही रहें? लेकिन भारतीय उदारवादी श्री गाँधी के संघ पर विचार कितनी सहजता से क्यों न ले, परन्तु उनके विचारों के प्रति अल्पसंख्यकों की प्रतिक्रिया सम्मानजनक है। अल्पसंख्यक समझौते पर सर्व-सम्मति नहीं हुई थी क्योंकि इसके प्रावधानों में रूढि़वादी हिन्दूओं और विशेष रूप से सिखों के प्रति विरोधी तत्व थे जिससे श्री गाँधी का आक्रोश बढ़ गया था। समझौता, जिस दिन हुआ उसी दिन समाप्त हो गया। इसके समाप्त हो जाने की तत्काल अभिस्वीकृति ब्रिटिश एवं भारतीय शिष्टमण्डल ने एक साथ दी जैसा कि अब हर कोई स्वीकार करता है कि जातीय समझौता ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किया जाना चाहिए था। (द ट्रेजेडी ऑफ गाँधी, पृष्ठ-277-270) ख्1,

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धनजय कीर, जीवनी लेखक ने कहा

‘‘पूना समझौते ने पूरे देश को झकझोर दिया तथा इसकी प्रतिक्रिया पूरे विश्व में हुई। एक बार फिर यह सिद्ध हुआ कि डॉ. अम्बेडकर जिन्हें पूना समझौता से पूर्व के दिनों में कांग्रेसी नेताओं और प्रेस ने दलित वर्गों के नेता के रूप में मानने से इन्कार कर दिया था, पूरे भारत में दलित वर्गों के अधिकृत नेता के रूप में उभर कर आये। नये समझौते से दोनों पक्षों को कुछ न कुछ खोना पड़ा। हिन्दू जाति को 71 सीटों की बजाय 148 सीटें देनी पड़ीं। दलित वर्गों ने हिन्दू जाति के नेताओं को अपनी इच्छानुसार झुकाने का विकल्प खो दिया क्योंकि दलित वर्गों को निर्णय के अनुसार विधानसभाओं में अपने प्रतिनिधियों को अलग से चुनना था और इसके साथ ही हिन्दू जाति के प्रतिनिधियों को चुनने के लिए सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में हिन्दू जाति के साथ मतदान करना था। अब हिन्दू जाति को दलित वर्गों के प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार मिल गया था। 26 सितम्बर को दिल्ली सत्र में अपने प्रस्ताव द्वारा हिन्दू महासभा ने भी इसके अनुमोदित किया।

  1. खैरमोरे, खण्ड 4, पृष्ठ 170-172।