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मैं पहले ही डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव के संबंध में अपने विचार व्यक्त कर चुका हूँ कि दलित वर्गों को हिन्दूवाद छोड़कर किसी अन्य धर्म को स्वीकार कर लेना चाहिए। मैंने धर्मान्तरण जो कि आध्यात्मिक परिवर्तन है और एक सम्प्रदाय से दूसरे सम्प्रदाय में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक कारणों से अन्तरण के बीच अंतर मानता हूँ।
प्रिय डॉ. मुज्जे, आप मुझे मेरे इस कथन पर क्षमा करेंगे कि आपने डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव को दृष्टिगत रखते हुए दलित वर्गों की सारी समस्याओं को साम्प्रदायिक अन्तरण के रूप और न कि धार्मिक समस्या के रूप में देखा है। हर कोई हिन्दू महासभा के अध्यक्ष से यह आशा रखता है कि इसे धार्मिक समस्या के रूप में देखें और इसे सामाजिक एवं आर्थिक समस्या के रूप में न देखते हुए केवल राजनीतिक समस्या के रूप में न देखें। कोई भी आपकी चिंता को समझ सकता है यदि हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में आपने दलित वर्गों के आध्यात्मिक कल्याण को सर्वो परि रखा है और सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के संबंध में बाद में सोचा है तथा सबसे अन्त में राजनीतिक पहले को रखा है। आपकी राजनीतिक योजना में दलित वर्गों की स्थिति के प्रति उत्कंठा न केवल इन वर्गों के लिए आपकी चिंता की प्रकृति दर्शाती है परन्तु यह घोड़े के आगे गाड़ी लगाने जैसा हो जिसका अर्थ यह है कि सही उपाय करने के बदले अनुपयुक्त उपाय करना। हिन्दू महासभा के अध्यक्ष होने के नाते आपसे हर कोई यह अपेक्षा रखता है कि इन वर्गों की नागरिक एवं सामाजिक असमर्थताओं को दूर करते हुए दलित वर्गों की सामाजिक दशा में सुधार करें और अन्य आराधकों की भान्ति हिन्दू मंदिरों में उनके लिए पूजा का अधिकार हासिल करें तथा पूरे भारत में गाँधी जी द्वारा चलाये गये हरिजन आन्दोलन को आगे बढ़ायें। ऐसा करने की बजाय आप जो कर रहे हैं वह क्या है? आप दलित वर्गों का बँटवारा कर रहे हैं और धार्मिक रूप से उन्हें सिखों के साथ जोड़ते हुए राजनीतिक रूप से हिन्दू ही बनाए रख रहे हैं।
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि दलित वर्गों के हित पर विचार नहीं किया जा रहा परन्तु हिन्दुओं और सिखों के साम्प्रदायिक हितों में योजनायें बनाई जा रही हैं। हम भेडं़े ओर जानवर नहीं हैं जिनका इस प्रकार विनिमय किया जाये और विभिन्न सम्प्रदायों के नेताओं के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान के परिणामस्वरूप