तर्कसंगत निरर्थकता - Page 497

480 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तर्कसंगत निरर्थकता
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बात को आगे बढ़ाते हुए श्री राजभोग ने पूछा कि यदि हिन्दुत्व से धर्मांतरित हुए नव-धर्मांतरितों को पूना समझौता के अधीन मिलने वाली सुविधायें दी जाएगी तो पुराने धर्मांतरितों को जो धार्मिक नहीं, राजनीतिक कारणों से सुविधा चाहते हैं। सुविधाओं की मांग क्यों नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि यहाँ पर काफी संख्या में दलित वर्ग हैं जिन्होंने अन्य धर्मों को स्वीकार किया है परन्तु हरिजन समुदाय से जुड़ी असमर्थताओं को अपने से अलग नहीं कर पाये हैं एवं उन्होंने मद्रास के कुछ हिस्सों में ईसाईयों के मामले का उल्लेख किया। जिन लोगों ने असुविधाजनक एवं कठिनाइयों में मेहनत कर रियायतें एवं सुविधायें प्राप्त की हैं वो उनको क्यों दिया जाए जो असुविधायें नहीं चाहते हैं परन्तु केवल अन्य लोगों की मेहनत का लाभ उठाना चाहते हैं।

पूना के नेता का कहना है, कि यह सूत्र एक दोषपूर्ण सूत्र है और इससे अत्यधिक समस्यायें एवं अन्तहीन संकट उत्पन्न होगी। इसे हिन्दुओं या किसी अन्य द्वारा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। हम हिन्दू हैं या हिन्दू नहीं हैं। यदि हम हिन्दू संघ में ही रहने का चुनाव करते हैं तो हम हिन्दू के रूप में अपने अधिकारों एवं विशेषाधिकारों के हकदार हैं, यदि हम एक बार संघ को छोड़ देते हैं तो हम कोई दावा नहीं कर सकते हैं।

इस वक्तव्य का खंडन करते हुए कि पूना समझौता स्वीकार कर हिन्दुओं ने कोई त्याग नहीं किया है, श्री राजभोग ने कहा कि साम्प्रदायिक निर्णय के अनुसार दलित वर्ग को 71 सीटें देने की बजाय समझौते के अनुसार उन्हें 148 सीटें दी गई हैं। अपनी बात को समाप्त करते हुए श्री राजभोग ने दृढ़तापूर्वक कहा कि हरिजन समुदाय में धर्मान्तरण के प्रति किसी प्रकार का व्यापक आकर्षण नहीं है। महाराष्ट्र में भी केवल महार ही इस विचार के पक्ष थे परन्तु चमार किसी भी धर्मान्तरण का दृढ़ता से विराध्ध कर रहे थे। इस विचार के अन्य प्रान्तों से कोई समर्थन नहीं मिल रहा था और वे हैरान थे कि हिन्दू नेता इसमें कैसे शामिल हैं।’’ ख्1,

  1. दिनांक 15 अगस्त, 1936 : द बाँबे क्रांनिकल।