मुज्जे - राजा समझौता - Page 499

482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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मुज्जे - राजा समझौता

महोदय, यद्यपि डॉ. मुज्जे ख्2, और हिन्दू महासभा हिन्दुत्व से अस्पृश्नीयता का कलंक मिटाने में और इस प्रकार हिन्दू संगठनों को सशक्त एवं सुदृढ़ बनाने में असमर्थ रहे हों, परंतु वे दलित वर्ग के एक नेता को इस बात के मद्देनजर अपने शिकंजे में लेने में सफल हुए हैं कि इन वर्गों के दर्जों में विभाजन कर दिया जाए। मुज्जे-राजा समझौते को कांग्रेस एवं महासभा की शाखाओं द्वारा समर्थन दिया जा रहा है तथा भोले-भाले नागरिकों को बताया जा रहा है कि समझौता अधिकांश दलित वर्ग द्वारा समर्थित है। वास्तव में मुज्जे-राजा समझौते की निन्दा देश में दलित वर्गों के लगभग सभी अधिकृत नेताओं एवं प्रतिष्ठित संगठनों द्वारा की जा रही है। लेकिन कांग्रेस एवं महासभा की शाखाओं ने समझौते के संबंध में किए जा रहे कड़े विरोध को दबाने के लिए षडयंत्र रचा है।

यह राव बहादुर एम.सी. राजा थे, 1 जो अलग -अलग निर्वाचन क्षेत्र के पक्ष में थे जब कि डॉ. अम्बेडकर संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों एवं सीटों के आरक्षण की वकालत कर रहे थे और श्री राजा और मद्रास प्रेजीडेन्सी में दलित वर्ग संगठन दबाव था कि डा. अम्बेडकर को अपना निजी दृष्टिकोण को छोड़ना होगा और गोल मेज सम्मेलन में अलग प्रतिनिधित्व के लिए मॉंग करनी होगी। उन्हें अपनी मॉंग के लिए श्री राजा से समर्थन प्राप्त हुआ, जिन्होंने कुछ सप्ताह पूर्व ही अपने भाषण में अपनी राय दी थी कि दलित वर्गों की दासता केवल अलग निर्वाचन क्षेत्र से ही समाप्त होगी। उसके इस नये ढकोसले से सभी आश्चर्यचकित थे। उन्होंने अन्य नेताओं एवं विभिन्न प्रान्तों में दलित वर्गों के उत्तरदायी संगठनों से परामर्श किये बिना हिन्दू महासभा के नेताओं के साथ संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों एवं आरक्षित सीटों के लिए समझौता किया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी नई नीति को उचित ठहराने के लिए कोई कारण नहीं

  1. मुन्जे - राजा समझौता - राव बहादुर एम.सी. राजा, मद्रास के दलित वर्ग के एक नेता तथा

डॉ. बी.एस. मुन्जे, हिंदु महासभा के अध्यक्ष ने दिल्ली में आरक्षित सीटों और संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों

के आधर पर विचार विमर्श किया था। उन्होंने एक समझौता किया, जिस राजा- मुन्जे समझौता 2 . डॉ. बी.एस. मुन्जे - वे हिंदु महासभा के अध्यक्ष थे तथा भारतीय गोल मेज सम्मेलन के सुखड़े, के नाम से जाना जाता है।

खण्ड 1, पृष्ठ 143-144।