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शोषित वर्ग के हजारों से अधिक सदस्यों ने भाग लिया। हॉल खचाखच भरा हुआ था और मंच पर तथाकथित अछूतों के हिन्दू जाति के कुछ मित्र तथा इसके अतिरिक्त अछूत वर्गों के अधिकांश प्रख्यात सदस्य मौजूद थे।
अधिकांश भाषण इनके द्वारा दिए गए थे और वे अपने नेता डॉ. अम्बेडकर के प्रतिनिष्ठा और श्रद्धा से परिपूर्ण थे। एक वक्ता ने अत्यधिक प्रभावशाली ढंग से बोला क्योंकि वे उनमें से एक थे जिन पर पिछले मार्च में जब प्रसिद्ध तालाब से जल लेने का पहला प्रयास किया गया था, किसी सवर्ण हिन्दूओं द्वारा हमला किया गया था।
उस समय यह अन्धाधुंध परिचालित किया गया था कि खालों को तालाब में धोया गया है और मोची जाति का होने के कारण, क्षतिग्रस्त सज्जन की कहानी गढ़ी गई और उसपर निरर्थक हमला थोपा गया। जैसाकि एक अन्य वक्ता ने स्पश्ट किया कि वास्तव में पानी उसके द्वारा लिया गया था और उस अन्य सज्जन को हमला झेलना पड़ा; जिनका नाम राजभोज है और जिन्हें हास्यपूर्वक भोज राजा कहा जाता था। पिछले रविवार की बैठक में कोई भी व्यक्ति स्पष्टतया जीवंतता देख सकता था।
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उन्हें देखना और अछूत कहना बेहूदा होगा। पुरातनपंथियों और रूढि़वादियों की नजरों में वे ऐसे ही थे। उन्हें न केवल अछूतपन से स्वयं को सुधारना होगा बल्कि उन रूढि़वादियों का भी उत्थान करना होगा जो पूर्वाग्रहों के दलदल में आकंठ डूबे हुए हैं। उनका संग्राम अनिवार्यतः देशभक्तिपूर्ण और मानवीय संघर्ष है।
ऐसे निर्जीव बोझ से राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। जब तक उन्हें समान बुनियादी अधिकार दिए और आश्वस्त नहीं किए जाते तब तक हिंदूवाद बेडि़यों में जकड़ा रहेगा। अपने अधिकारों का दावा करने और स्वयं का उत्थान करने में तथाकथित अछूत वर्गों के ये योद्धा देश और हिंदू धर्म का उत्थान कर रहे हैं। डॉ. अम्बेडकर अब सही दिशा में उत्सुकतापूर्वक अगला अभियान आयोजित करने में व्यस्त हैं। इसे संभवतः एक महीने के भीतर, हिन्दू नव वर्ष के दिन, जब प्रत्येक हिन्दू परिवार ध्वज फहराता है, प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया है। इन दलित और वंचित वर्गों के नेताओं ने उसी दिन ‘‘सभी के लिए समान मानवाधिकारों’’ का अपना ध्वज फहराना प्रस्तावित किया, और ईश्वर की इच्छा से वे इसे करेंगे। ख्1,
यह महाद सत्याग्रह के बारे में डी.वी. प्रधान का लेख इस प्रकार है -
- द इंडियन नेश्नल हेराल्ड, दिनांक 28 फरवरी, 1928।